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बिहार में ‘सम्राट युग’ की शुरुआत

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 14 अप्रैल
  • 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

पटना। बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होती दिखाई दे रही है। नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा दांव खेलते हुए सम्राट चौधरी को विधायक दल का नेता चुन लिया है। इसके साथ ही उनका मुख्यमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है। एनडीए अब राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश करने की तैयारी में है। इस राजनीतिक घटनाक्रम ने बिहार की सियासत में हलचल तेज कर दी है। सवाल उठ रहा है कि आखिर बीजेपी ने सम्राट चौधरी पर ही भरोसा क्यों जताया। इसके पीछे कई ठोस राजनीतिक और सामाजिक समीकरण काम कर रहे हैं।


पार्टी में तेजी से बढ़ता कद बना निर्णायक

साल 2018 में बीजेपी में शामिल होने के बाद सम्राट चौधरी ने संगठन में अपनी मजबूत पकड़ बनाई। 2019 में जब नित्यानंद राय प्रदेश अध्यक्ष थे, तब उन्हें उपाध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद 2020 में वे विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) बने। 2022 में जब नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव के साथ मिलकर सरकार बनाई, तब बीजेपी ने बिहार में नई रणनीति तैयार की। इसी कड़ी में सम्राट चौधरी को विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया, जिससे उनका कद और मजबूत हुआ।


राजनीतिक अनुभव और मजबूत पृष्ठभूमि

सम्राट चौधरी का राजनीतिक अनुभव भी उनके पक्ष में गया। उनकी शुरुआती राजनीतिक प्रशिक्षण लालू प्रसाद यादव के मार्गदर्शन में हुआ। उनके पिता शकुनी चौधरी भी बिहार की राजनीति में प्रभावशाली रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठनात्मक अनुभव और विभिन्न दलों के साथ काम करने की क्षमता ने उन्हें एक संतुलित और स्वीकार्य चेहरा बनाया है। साथ ही, नीतीश कुमार की सहमति को भी इस फैसले में अहम माना जा रहा है।


‘लव-कुश’ समीकरण साधने की रणनीति

बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। सम्राट चौधरी कुशवाहा (कोईरी) समाज से आते हैं, जबकि नीतीश कुमार कुर्मी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। बीजेपी ने सम्राट चौधरी को आगे कर ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कुशवाहा) समीकरण को साधने की रणनीति अपनाई है। यह वर्ग राज्य की राजनीति में एक बड़ा वोट बैंक माना जाता है। ऐसे में बीजेपी का यह कदम आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर उठाया गया एक दूरगामी राजनीतिक निर्णय माना जा रहा है।


नई सरकार से उम्मीदें और चुनौतियां

सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनने वाली सरकार के सामने कई चुनौतियां होंगी, जिनमें आर्थिक स्थिति, रोजगार, कानून-व्यवस्था और विकास की रफ्तार को बनाए रखना प्रमुख है। वहीं, बीजेपी के लिए यह एक अवसर भी है कि वह बिहार में अपनी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत करे।

कुल मिलाकर, सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री पद पर आना सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में नए समीकरणों और रणनीतियों की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

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