top of page

विज्ञापन के लिए संपर्क करेंअपने व्यवसाय, संस्थान, उत्पाद, सेवा, कार्यक्रम या ब्रांड का प्रचार भारतार्थ खबर के माध्यम से लाखों पाठकों तक पहुँचाएँ।विज्ञापन, प्रायोजित लेख, बैनर विज्ञापन एवं प्रचार संबंधी जानकारी के लिए संपर्क करें:📧 news@bhaarataarth.com📧 livenews@bhaarataarth.com🌐 Website: https://www.bhaarataarth.comभारतार्थ खबर — खबर नहीं, उसका अर्थ।“देश-दुनिया की हर बड़ी खबर – भारतार्थ खबर”

उत्तर प्रदेश सहित सभी राज्यों की प्रमुख खबरें, स्थानीय घटनाएँ और राष्ट्रीय महत्व के समाचार एक ही मंच पर।

फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकार, अब बदलेंगे शहरों के रास्ते?

  • Writer: Tic rocs
    Tic rocs
  • Jul 12
  • 2 min read
Crowded city street market with colorful umbrellas, auto rickshaws, cars, and pedestrians in a busy daytime scene.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने सुरक्षित फुटपाथों और पैदल यात्रियों के अधिकार पर छेड़ी नई बहस

भारतार्थ खबर। संवाददाता: अशोक कुमार सिंह (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली | 12 जुलाई, 2026 सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित फुटपाथों पर सुरक्षित रूप से चलने को मौलिक अधिकार मानने के बाद देशभर में शहरी विकास और सड़क सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल फुटपाथ बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के शहरों की पूरी सड़क व्यवस्था, शहरी नियोजन और पैदल यात्रियों की सुरक्षा को नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर भी है।


भारत में पहले से ही इंडियन रोड्स कांग्रेस (IRC-103-2012) और URDPFI Guidelines के तहत सुरक्षित फुटपाथों के लिए दिशा-निर्देश मौजूद हैं। इसके बावजूद सड़क दुर्घटनाओं में पैदल यात्रियों की मौतें लगातार चिंता का विषय बनी हुई हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में देश के बड़े शहरों में सड़क दुर्घटनाओं से हुई मौतों में लगभग 20.6 प्रतिशत पैदल यात्री थे। दिल्ली, बेंगलुरु और जयपुर सबसे अधिक प्रभावित शहरों में शामिल रहे।


विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल मानकों की कमी नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। देश के पुराने और घनी आबादी वाले क्षेत्रों—जैसे बेंगलुरु का चिकपेट, हैदराबाद के पुराने मोहल्ले और मुंबई की कई बस्तियां—में राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप चौड़े फुटपाथ बनाना व्यावहारिक रूप से कठिन है। ऐसे क्षेत्रों में संकरी गलियां, अतिक्रमण और सीमित स्थान बड़ी चुनौती बन जाते हैं।


हमने तीन प्रमुख चुनौतियों का उल्लेख किया गया है। पहली चुनौती राष्ट्रीय मानकों और स्थानीय परिस्थितियों के बीच असंतुलन है। दूसरी चुनौती वित्तीय संसाधनों और बड़े पैमाने पर फुटपाथ निर्माण की लागत से जुड़ी है। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण चुनौती विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी है, जिसके कारण सड़कों के डिजाइन, निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी स्पष्ट नहीं हो पाती।


विशेषज्ञों ने दिल्ली के अजमल खान रोड का उदाहरण देते हुए बताया कि कम लागत में भी बेहतर सड़क और फुटपाथ विकसित किए जा सकते हैं। वहां व्यापक निर्माण के बजाय रंगीन लेन मार्किंग, हरित क्षेत्र और सीमित स्ट्रीट फर्नीचर का उपयोग कर पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित और आकर्षक वातावरण तैयार किया गया।


शहरी योजनाकारों का मानना है कि आने वाले वर्षों में केवल चौड़े फुटपाथ बनाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए स्थानीय जरूरतों के अनुसार डिजाइन, पुनर्चक्रित निर्माण सामग्री, नागरिकों की भागीदारी और नगर निकायों को अधिक अधिकार देने की आवश्यकता होगी।


सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला 'विकसित भारत' के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि राज्यों और नगर निकायों ने इसे गंभीरता से लागू किया तो देश के करोड़ों पैदल यात्रियों को सुरक्षित, सुगम और सम्मानजनक आवागमन का अधिकार वास्तविक रूप से मिल सकेगा।

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page