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‘नमामि देवि नर्मदे’ का भव्य लोकार्पण, अमरकंटक में आध्यात्मिक-साहित्यिक महोत्सव

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • May 2
  • 2 min read
स्वामी हरिहरानंद सरस्वती द्वारा पुस्तक विमोचन का भव्य दृश्य, namami-devi-narmade-launch-amarkantak.jpg
स्वामी हरिहरानंद सरस्वती द्वारा पुस्तक विमोचन का भव्य दृश्य, namami-devi-narmade-launch-amarkantak.jpg

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) अमरकंटक से विशेष रिपोर्ट

अमरकंटक। आस्था, अध्यात्म और साहित्य का अद्वितीय संगम उस समय देखने को मिला जब अमरकंटक की पावन वादियों में स्थित श्री मृत्युंजय आश्रम में अंतरराष्ट्रीय साझा काव्य संकलन ‘नमामि देवि नर्मदे’ का भव्य लोकार्पण संपन्न हुआ। पूज्य स्वामी हरिहरानंद सरस्वती के करकमलों से हुए इस दिव्य आयोजन ने न केवल श्रद्धालुओं को भावविभोर किया, बल्कि साहित्यिक जगत में भी नई ऊर्जा का संचार किया। इसकी भव्यता, दिव्यता और सांस्कृतिक गरिमा स्पष्ट झलकती है—देशभर से आए संत, विद्वान और हजारों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बने। नर्मदा तट की पवित्रता, भक्ति के स्वर, और साहित्य की गूंज ने इस आयोजन को एक अलौकिक, प्रेरणादायक और यादगार महोत्सव में बदल दिया।

साहित्य: आत्मा का प्रकाश

अपने ओजस्वी और प्रेरणादायक उद्बोधन में स्वामी हरिहरानंद सरस्वती जी महाराज ने साहित्य की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि

“साहित्य केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि यह आत्मा का प्रकाश है, जो मानव जीवन के अंधकार को दूर कर सन्मार्ग की ओर ले जाता है।”

उन्होंने आगे कहा कि ‘नमामि देवि नर्मदे’ जैसे काव्य संकलन न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा के वाहक हैं, बल्कि यह मानवता को जोड़ने वाले सेतु भी हैं। यह ग्रंथ नर्मदा मैया के प्रति अटूट श्रद्धा और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।


वैश्विक सहभागिता: 170 रचनाकार

संकलन के प्रधान संपादक डॉ. सुनील परीट ने बताया कि इस अंतरराष्ट्रीय काव्य संग्रह में भारत के लगभग सभी राज्यों के साथ-साथ अमेरिका, मॉरीशस, बेल्जियम, इंग्लैंड और ओमान जैसे देशों के 170 से अधिक रचनाकारों की रचनाएं शामिल हैं। सह-संपादक डॉ. सोमदत्त काशीनाथ के योगदान को भी विशेष रूप से सराहा गया। यह संकलन न केवल साहित्यिक विविधता को दर्शाता है, बल्कि नर्मदा मैया के प्रति वैश्विक आस्था का जीवंत प्रमाण भी है।

भक्ति, संस्कृति और चेतना का संगम

कार्यक्रम में राममूर्ति मिश्र, राजेंद्र अग्रवाल सहित अनेक संत-महात्मा और साहित्यकारों की गरिमामयी उपस्थिति रही। नर्मदा स्तुति, भजन और आध्यात्मिक प्रवचनों ने वातावरण को दिव्यता से भर दिया। वक्ताओं ने कहा कि नर्मदा नदी केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवनरेखा है—श्रद्धा, तप और मोक्ष का प्रतीक।

आपके मन में उठ रहे सवाल?

• क्या आज के डिजिटल युग में आध्यात्मिक साहित्य की प्रासंगिकता बढ़ रही है?

• क्या युवा पीढ़ी ऐसे सांस्कृतिक आयोजनों से जुड़ रही है?

• क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय आध्यात्मिकता का प्रभाव बढ़ रहा है?

• क्या ऐसे आयोजन सांस्कृतिक एकता को मजबूत करते हैं?

Q1. ‘नमामि देवि नर्मदे’ क्या है?

Q2. इस पुस्तक का लोकार्पण कहां हुआ?

Q3. इसमें कितने रचनाकार शामिल हैं?

Q4. इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

✍️ अब आपकी बारी!

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