दिल्ली एंट्री महंगी, ट्रांसपोर्ट पर बोझ
- धन्ना राम चौधरी

- 19 अप्रैल
- 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में प्रवेश करने वाले वाणिज्यिक वाहनों के लिए अब सफर पहले से ज्यादा महंगा हो गया है। दिल्ली नगर निगम (MCD) ने पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) में उल्लेखनीय बढ़ोतरी करते हुए ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को बड़ा झटका दिया है। इस फैसले का सीधा असर माल ढुलाई लागत पर पड़ेगा, जिसका भार अंततः आम उपभोक्ताओं तक पहुंचने की आशंका है।
भारी वाहनों पर बढ़ा शुल्क
एमसीडी के नए आदेश के अनुसार, दिल्ली में प्रवेश करने वाले विभिन्न श्रेणी के ट्रकों पर ईसीसी शुल्क में भारी वृद्धि की गई है।
Two XL (दो एक्सल) ट्रक: पहले ₹1400, अब ₹2000, Three & Four XL (तीन और चार एक्सल) ट्रक: पहले ₹2600, अब ₹4000
यह बढ़ोतरी उन हजारों ट्रांसपोर्टरों के लिए चिंता का विषय बन गई है, जो रोजाना दिल्ली में माल की आपूर्ति करते हैं।
हर दिन हजारों वाहनों की आवाजाही
आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में प्रतिदिन बड़ी संख्या में कमर्शियल वाहन प्रवेश करते हैं। लगभग 3500 दो एक्सल ट्रक, करीब 1500 तीन और चार एक्सल ट्रक कुल मिलाकर करीब 70,000 वाणिज्यिक वाहन (कैब और टैक्सी सहित) NCR से दिल्ली में प्रवेश करते हैं। ऐसे में शुल्क बढ़ोतरी का व्यापक प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है।
क्या है ECC और क्यों जरूरी?
पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) एक तरह का ‘ग्रीन टैक्स’ है, जिसे वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों को कम करने और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को मजबूती देने के उद्देश्य से वसूला जाता है। यह शुल्क टोल नाकों पर लिया जाता है और इसकी राशि दिल्ली सरकार के विशेष पर्यावरण कोष में जमा की जाती है।
ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय से ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स, पैकर्स एंड मूवर्स और थोक व्यापार से जुड़े कारोबारियों की लागत बढ़ेगी। ईंधन, टोल और अन्य खर्चों के साथ यह अतिरिक्त भार व्यवसायों की लागत संरचना को प्रभावित करेगा।
उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा असर
बढ़ी हुई लागत का असर बाजार में वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है। माल ढुलाई महंगी होने से जरूरी सामानों की कीमतों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।
पर्यावरण बनाम आर्थिक दबाव
एक ओर जहां यह कदम प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इससे ट्रांसपोर्टरों और व्यवसायियों पर आर्थिक दबाव बढ़ना तय है। अब देखना होगा कि सरकार इस संतुलन को बनाए रखने के लिए आगे क्या कदम उठाती है।
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