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तमिल अस्मिता बनाम ‘दिल्ली नियंत्रण’—आरोपों की आग में तमिलनाडु चुनाव

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 30 मार्च
  • 2 मिनट पठन

अपडेट करने की तारीख: 18 अप्रैल

M.K. Stalin speaking with portraits of Tamil leaders

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

चेन्नई। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राज्य की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। इस बार चुनावी मुकाबला केवल विकास और वादों तक सीमित नहीं है, बल्कि “तमिल अस्मिता” बनाम “दिल्ली के प्रभाव” का मुद्दा भी केंद्र में आ गया है। प्रमुख राजनीतिक दल एक-दूसरे पर यह आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने राज्य के स्वाभिमान से समझौता किया है।


राज्य की राजनीति में हमेशा से ही चुनावी रंगत अलग रही है। जहां उत्तर भारत में चुनाव प्रचार के पारंपरिक तरीके देखने को मिलते हैं, वहीं तमिलनाडु में राजनीतिक दल मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए मिक्सर, ग्राइंडर, वॉशिंग मशीन जैसी घरेलू वस्तुएं वितरित करते रहे हैं। इस परंपरा के बीच इस बार वैचारिक टकराव भी खुलकर सामने आ गया है।

डीएमके का हमला: ‘दिल्ली से संचालित विपक्ष’

सत्तारूढ़ दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के नेता और मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी के राजनीतिक फैसले तमिलनाडु में नहीं, बल्कि दिल्ली में लिए जाते हैं। उन्होंने बिना नाम लिए ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) पर आरोप लगाया कि वह केंद्र के दबाव में काम कर रही है। स्टालिन के इस बयान को भाजपा की बढ़ती सक्रियता से जोड़कर देखा जा रहा है। हाल के दिनों में ने तमिलनाडु में गठबंधन राजनीति को लेकर कई अहम बैठकें की हैं, जिससे राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

एआईएडीएमके का पलटवार: ‘कांग्रेस के आगे झुकी डीएमके’

डीएमके के आरोपों का जवाब देते हुए एआईएडीएमके नेता ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि डीएमके खुद यूपीए शासनकाल में केंद्रीय एजेंसियों के दबाव में रही और कांग्रेस के सामने झुकती रही। एआईएडीएमके ने आरोप लगाया कि डीएमके ने एक समय कांग्रेस के साथ गठबंधन के दौरान बड़ी संख्या में विधानसभा सीटें छोड़ दी थीं, जो राज्य के हितों के खिलाफ था। पार्टी का कहना है कि डीएमके का इतिहास ही “समझौते की राजनीति” से भरा रहा है।

तमिल अस्मिता बना मुख्य चुनावी मुद्दा

दोनों दल खुद को “तमिल गौरव” का असली प्रतिनिधि साबित करने में जुटे हैं। डीएमके जहां क्षेत्रीय पहचान और राज्य के अधिकारों की बात कर रही है, वहीं एआईएडीएमके भी खुद को तमिल हितों का संरक्षक बता रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार चुनाव में स्थानीय बनाम राष्ट्रीय प्रभाव का मुद्दा निर्णायक भूमिका निभा सकता है। मतदाता यह तय करेंगे कि वे क्षेत्रीय स्वायत्तता को प्राथमिकता देते हैं या राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक मजबूती को।

चुनावी मुकाबला हुआ दिलचस्प

तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा से ही द्रविड़ दलों का वर्चस्व रहा है, लेकिन इस बार भाजपा की बढ़ती सक्रियता और गठबंधन समीकरणों ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। ऐसे में “तमिल अस्मिता” का मुद्दा चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि आरोप-प्रत्यारोप की इस सियासत में कौन-सा दल जनता का विश्वास जीतने में सफल होता है।

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