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जाते-जाते नीतीश का बड़ा फैसला, सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर पूर्ण रोक

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 12
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

पटना। सियासी उठापटक और नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं के बीच नीतीश कुमार ने बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। राज्य की कमान नए नेतृत्व को सौंपने से ठीक पहले सरकार ने सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी कर दिया है। इस फैसले ने स्वास्थ्य महकमे में हलचल मचा दी है और हजारों डॉक्टरों के बीच असंतोष की लहर दौड़ गई है।


स्वास्थ्य सुधार की दिशा में कड़ा कदम

बिहार सरकार सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी संकल्प के अनुसार अब सरकारी सेवा में कार्यरत कोई भी चिकित्सक निजी क्लिनिक नहीं चला सकेगा और न ही किसी निजी अस्पताल या नर्सिंग होम में सेवाएं दे पाएगा। यह फैसला सरकार के ‘सात निश्चय-2’ कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, लंबे समय से सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और निजी प्रैक्टिस में अधिक रुचि को लेकर सरकार चिंतित थी। कई शिकायतों के बाद यह सख्त निर्णय लिया गया, जिससे सरकारी अस्पतालों में मरीजों को बेहतर और नियमित सेवाएं मिल सकें।


एनपीए मिलेगा, लेकिन सख्ती भी बरकरार

सरकार ने इस आदेश के साथ यह भी स्पष्ट किया है कि डॉक्टरों को निजी प्रैक्टिस छोड़ने के एवज में गैर-प्रैक्टिस भत्ता दिया जाएगा। हालांकि, डॉक्टरों का एक बड़ा वर्ग इस फैसले से संतुष्ट नहीं है। उनका कहना है कि यह निर्णय उनकी आय पर सीधा असर डालेगा और कई विशेषज्ञ डॉक्टर राज्य से बाहर जाने पर विचार कर सकते हैं।


बड़े संस्थानों के डॉक्टर भी दायरे में

यह प्रतिबंध सिर्फ जिला अस्पतालों तक सीमित नहीं है, बल्कि मेडिकल कॉलेजों के प्रोफेसरों और विशेषज्ञ डॉक्टरों पर भी लागू होगा। इंदिरा गांधी कार्डियोलॉजी संस्थान जैसे प्रमुख संस्थानों में कार्यरत चिकित्सक भी अब निजी सेवाएं नहीं दे सकेंगे।


सियासी समय और फैसले की चर्चा

15 अप्रैल 2026 को संभावित नई सरकार के शपथ ग्रहण से पहले आए इस फैसले को राजनीतिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। इसे नीतीश कुमार का “विदाई से पहले बड़ा सुधारात्मक कदम” बताया जा रहा है। वहीं विपक्ष और चिकित्सा समुदाय के कुछ वर्ग इसे जल्दबाजी में लिया गया कठोर निर्णय बता रहे हैं।


असर क्या होगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस आदेश का सख्ती से पालन हुआ तो सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ सकती है और मरीजों को राहत मिल सकती है। हालांकि, यह भी आशंका जताई जा रही है कि इससे डॉक्टरों का मनोबल प्रभावित हो सकता है और राज्य में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी बढ़ सकती है। फिलहाल, यह आदेश लागू होने के साथ ही स्वास्थ्य विभाग और डॉक्टरों के बीच टकराव की स्थिति बनती दिख रही है। आने वाले दिनों में इसका वास्तविक प्रभाव राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं पर कितना पड़ेगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

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