कर्नाटक में महिलाओं को मासिक धर्म अवकाश अनिवार्य
- धन्ना राम चौधरी

- 16 अप्रैल
- 3 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, बेंगलूरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
बेंगलुरु, 16 अप्रैल। कर्नाटक हाई कोर्ट ने महिलाओं के मासिक धर्म स्वास्थ्य को लेकर एक ऐतिहासिक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि “मेनस्ट्रुअल लीव” नीति को सख्ती और ईमानदारी से लागू किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं, बल्कि महिलाओं के जीवन और गरिमा से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है। न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि मासिक धर्म स्वास्थ्य सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) से जुड़ा हुआ है। ऐसे में राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि दिसंबर 2025 से लागू इस नीति का लाभ हर पात्र महिला तक पहुंचे और यह केवल कागजी घोषणा बनकर न रह जाए।
हर महीने एक दिन का सवेतन अवकाश
अदालत द्वारा लागू इस नीति के तहत राज्य के सभी पंजीकृत संस्थानों में 18 से 52 वर्ष आयु वर्ग की महिला कर्मचारियों को प्रत्येक माह एक दिन का सवेतन अवकाश देना अनिवार्य किया गया है। इस प्रकार वर्षभर में अधिकतम 12 दिन का विशेष अवकाश महिलाओं को मिलेगा। यह व्यवस्था तब तक प्रभावी रहेगी, जब तक प्रस्तावित “कर्नाटक मेंस्ट्रुअल लीव एंड हाइजीन बिल” विधिवत पारित नहीं हो जाता।
असंगठित क्षेत्र पर विशेष जोर
कोर्ट ने अपने 82 पन्नों के विस्तृत आदेश में विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र—जैसे होटल, दुकानें, छोटे प्रतिष्ठान—में काम करने वाली महिलाओं की स्थिति पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि इन क्षेत्रों में अक्सर श्रमिक महिलाओं को अपने स्वास्थ्य से समझौता कर काम करना पड़ता है, जो उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। प्रशासनिक कठिनाइयों का हवाला देकर इस जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
समानता के तर्क को किया खारिज
इस नीति के खिलाफ उठ रहे अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) के तर्कों को अदालत ने सिरे से खारिज करते हुए कहा कि पुरुष और महिलाएं कानूनी रूप से समान हैं, लेकिन उनकी जैविक संरचना भिन्न है। ऐसे में महिलाओं की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बनाए गए प्रावधान समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक व्याख्या हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला
अपने आदेश में हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जनवरी 2026 के “जया ठाकुर बनाम भारत संघ” मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा माना था। हाई कोर्ट ने कहा कि इस दिशा में उठाया गया हर कदम संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करता है।
याचिका से खुली हकीकत
यह महत्वपूर्ण आदेश बेलगावी जिले की एक 41 वर्षीय होटल कर्मचारी की याचिका पर आया, जिसमें उसने बताया कि नीति लागू होने के बावजूद छोटे संस्थानों में इसका पालन नहीं हो रहा है। अदालत ने याचिकाकर्ता की पीड़ा को गंभीरता से लेते हुए माना कि जमीनी स्तर पर अभी भी बड़ी खाई बनी हुई है।
सरकार को सख्त निर्देश
राज्य सरकार ने कोर्ट में इस नीति को प्रगतिशील कदम बताते हुए असंगठित क्षेत्र में क्रियान्वयन को चुनौतीपूर्ण माना। हालांकि अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि चुनौतियां जिम्मेदारी से पीछे हटने का कारण नहीं बन सकतीं। प्रस्तावित कानून पारित होने के बाद सरकार को बिना देरी आवश्यक नियम बनाकर इसे पूरी तरह लागू करना होगा।
अलग कानून की तैयारी
वर्तमान श्रम कानूनों—जैसे फैक्ट्री एक्ट और दुकान एवं स्थापना अधिनियम—में मासिक धर्म अवकाश का प्रावधान नहीं होने के कारण राज्य सरकार अलग कानून लाने की तैयारी में है। प्रस्तावित विधेयक में छात्राओं को भी शामिल किए जाने और नियमों के उल्लंघन पर दंडात्मक प्रावधान का उल्लेख है। समग्र रूप से, कर्नाटक हाई कोर्ट का यह निर्णय न केवल महिला कर्मचारियों के स्वास्थ्य और सम्मान की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि कार्यस्थल पर संवेदनशीलता और समानता की नई मिसाल भी प्रस्तुत करता है।
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