उल्सूर झील बनी पक्षियों का स्वर्ग, पेलिकन ने बढ़ाई रौनक
- धन्नाराम चौधरी

- 19 जुल॰
- 2 मिनट पठन

बेंगलुरु की ऐतिहासिक झील में प्रवासी पक्षियों का बसेरा, प्रकृति प्रेमियों और फोटोग्राफरों के लिए बना आकर्षण का नया केंद्र
भारतार्थ खबर | संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु | 19 जुलाई, 2026 बेंगलुरु। शहर की ऐतिहासिक उल्सूर झील इन दिनों प्रकृति प्रेमियों और पक्षी फोटोग्राफरों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है। झील के विकास कार्य के दौरान जलस्तर उथला होने से पेलिकन, पेंटेड स्टॉर्क और कई अन्य प्रवासी पक्षियों ने यहां अपना अस्थायी बसेरा बना लिया है। बीते 15 से 20 दिनों से इन दुर्लभ पक्षियों की मौजूदगी ने उल्सूर झील को बेंगलुरु के सबसे आकर्षक प्राकृतिक स्थलों में शामिल कर दिया है।
झील के विकास कार्य से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, आगंतुकों की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए फिलहाल झील का जलस्तर नियंत्रित रखा गया है। यही उथला पानी प्रवासी पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण बन गया है, जहां उन्हें भोजन और विश्राम दोनों आसानी से मिल रहे हैं।
अधिकारियों ने बताया कि ग्रेटर बेंगलुरु प्रशासन (GBA) द्वारा लगभग 100 करोड़ रुपये की लागत से 108 एकड़ क्षेत्र में फैली इस ऐतिहासिक झील का व्यापक विकास किया जा रहा है। परियोजना के तहत झील की गाद निकाली जा रही है, दो-स्तरीय वॉकवे बनाए जा रहे हैं, सुरक्षा तटबंध विकसित किए जा रहे हैं, सजावटी ग्रिल और बेंच लगाए जा रहे हैं तथा झील को समीप के पार्क से जोड़ने के लिए एक आधुनिक पुल का निर्माण भी किया जा रहा है।
झील के एक वरिष्ठ अभियंता ने बताया कि वर्तमान में करीब 30 पेलिकन झील के द्वीप क्षेत्र में डेरा डाले हुए हैं, जबकि आसपास की आर्द्रभूमि में लगभग एक दर्जन पेंटेड स्टॉर्क भी देखे गए हैं। इन पक्षियों की मौजूदगी ने मॉर्निंग वॉक करने वालों, पर्यटकों और वन्यजीव फोटोग्राफरों का उत्साह बढ़ा दिया है। पेंटेड स्टॉर्क अपेक्षाकृत इंसानों के करीब आ जाते हैं, जबकि पेलिकन दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं।
हालांकि अधिकारियों ने चिंता भी जताई है कि कुछ लोग झील के आसपास कबूतरों और चूहों को भोजन खिला रहे हैं, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने नागरिकों से अपील की है कि वे झील की स्वच्छता और जैव विविधता को बनाए रखने में सहयोग करें।
उल्सूर झील में लौटे इन प्रवासी पक्षियों ने यह संकेत भी दिया है कि यदि जलाशयों का संरक्षण और वैज्ञानिक तरीके से विकास किया जाए, तो शहरी क्षेत्रों में भी प्राकृतिक जैव विविधता को बढ़ावा दिया जा सकता है।
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