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उर्दू मेनिफेस्टो पर सियासी संग्राम, ओवैसी ने ममता पर साधा निशाना

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 1 day ago
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

कोलकाता/पटना। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। इसी बीच तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) द्वारा उर्दू भाषा में चुनावी घोषणापत्र जारी किए जाने पर नया विवाद खड़ा हो गया है। इस मुद्दे को लेकर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोला है और उनके रुख को “दोहरा चरित्र” करार दिया है।


पटना में मीडिया से बातचीत करते हुए ओवैसी ने कहा कि केवल उर्दू में मेनिफेस्टो जारी करना मुसलमानों के वास्तविक मुद्दों का समाधान नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में मुसलमानों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति अब भी कमजोर बनी हुई है, जबकि सरकार प्रतीकात्मक राजनीति में व्यस्त है। ओवैसी ने कलकत्ता हाई कोर्ट के उस फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें पिछले वर्ष राज्य सरकार द्वारा जारी लगभग पांच लाख पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया गया था। उनके अनुसार, इनमें बड़ी संख्या मुसलमानों की थी, लेकिन इस मुद्दे पर सरकार की ओर से कोई ठोस पहल नहीं दिखाई दी।


उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल की कुल आबादी में करीब 29 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने के बावजूद सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की भागीदारी मात्र 7 प्रतिशत है। साथ ही, स्कूली शिक्षा छोड़ने वाले छात्रों में भी मुस्लिम समुदाय की संख्या अधिक है और खासकर लड़कियों की साक्षरता दर चिंताजनक बनी हुई है। मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वहां के मुसलमान राज्य के अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक गरीबी का सामना कर रहे हैं। इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं यहीं नहीं थमीं। केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता गिरिराज सिंह ने भी तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि पार्टी लंबे समय से भाषाई और तुष्टीकरण की राजनीति कर रही है। उन्होंने दावा किया कि इस बार राज्य की जनता इस राजनीति का जवाब चुनाव में देगी।


उधर, तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस विवाद पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी माहौल में इस तरह के मुद्दे आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ सकते हैं। पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मी के बीच यह विवाद अब केवल भाषा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक रणनीति जैसे बड़े सवालों को भी केंद्र में ला खड़ा कर रहा है।

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