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ईरान युद्ध पर कांग्रेस में मतभेद उजागर, तिवारी-थरूर ने सरकार के रुख को बताया व्यावहारिक

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Mar 20
  • 2 min read

Updated: Mar 23

फाइल फोटो

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध को लेकर भारत सरकार के रुख पर कांग्रेस पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। जहां एक ओर पार्टी नेतृत्व केंद्र सरकार की आलोचना कर रहा है, वहीं वरिष्ठ कांग्रेस नेता मनीष तिवारी और शशि थरूर ने सरकार के संतुलित और सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण का समर्थन किया है। इससे कांग्रेस के भीतर विदेश नीति को लेकर अलग-अलग विचारधाराएं उभरती दिख रही हैं।


तिवारी बोले—यह भारत का युद्ध नहीं, संयम जरूरी

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने स्पष्ट कहा कि मिडिल ईस्ट में चल रहा संघर्ष भारत का युद्ध नहीं है और देश को इसमें सतर्कता के साथ कदम उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में लगभग 48 लाख भारतीय रहते हैं, जिनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।


तिवारी ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा का भी हवाला दिया और कहा कि देश कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस के साथ-साथ उर्वरकों के लिए भी इस क्षेत्र पर निर्भर है। ऐसे में सरकार यदि सावधानी बरत रही है तो यह एक जिम्मेदार और व्यावहारिक कदम है।


कांग्रेस नेतृत्व का सरकार पर हमला

दूसरी ओर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने केंद्र सरकार के रुख की आलोचना की है। राहुल गांधी ने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन पर प्रधानमंत्री की चुप्पी चिंताजनक है।


राहुल गांधी ने यह भी कहा कि इस संकट के कारण लगभग एक करोड़ भारतीयों समेत करोड़ों लोग अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। उन्होंने सभी पक्षों द्वारा संप्रभुता के उल्लंघन और एकतरफा हमलों की निंदा की आवश्यकता पर जोर दिया।


हालांकि, सरकार की ओर से विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास जाकर शोक पुस्तिका में हस्ताक्षर किए, जिसे भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया माना गया।


रूर ने किया सरकार का बचाव

कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी सरकार के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि भारत की चुप्पी को कायरता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि चुप्पी का अर्थ समर्थन नहीं होता, बल्कि यह एक सोच-समझकर लिया गया कूटनीतिक निर्णय है।


थरूर ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि आज की बहुध्रुवीय दुनिया में भारत को सभी पक्षों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की जरूरत है, भले ही वे आपस में संघर्षरत हों।


उन्होंने यह भी माना कि ईरान के खिलाफ युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उचित नहीं है, लेकिन भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए संयम बरतना चाहिए। थरूर के अनुसार, “संयम ही शक्ति है, जो सिद्धांत और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाती है।”


कांग्रेस में उभरी दो धाराएं

इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस पार्टी के भीतर विदेश नीति को लेकर दो स्पष्ट धाराएं उजागर कर दी हैं—एक धड़ा जहां सरकार के रुख की आलोचना कर रहा है, वहीं दूसरा धड़ा राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए संतुलित कूटनीति का समर्थन कर रहा है।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मतभेद आने वाले समय में कांग्रेस की विदेश नीति पर आंतरिक बहस को और तेज कर सकता है।

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