भारत का नया इंटरनेट क्रैकडाउन? धारा 69A की पूरी जानकारी
- धन्ना राम चौधरी

- 20 मार्च
- 3 मिनट पठन
अपडेट करने की तारीख: 23 मार्च

फाइल फोटो
भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
नई दिल्ली। देश में डिजिटल स्पेस को नियंत्रित करने की दिशा में सरकार एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर मौजूद कंटेंट की निगरानी को और सख्त बनाने के लिए आईटी एक्ट की धारा 69A के तहत अधिकारों का दायरा बढ़ाने की चर्चा तेज हो गई है। प्रस्तावित बदलाव के अनुसार, अब केवल एक मंत्रालय नहीं बल्कि कई मंत्रालयों को आपत्तिजनक कंटेंट ब्लॉक करने का अधिकार दिया जा सकता है। इस खबर के सामने आते ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
क्या है धारा 69A?
सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की धारा 69A केंद्र सरकार को यह अधिकार देती है कि वह इंटरनेट पर उपलब्ध किसी भी कंटेंट—जैसे वेबसाइट, ऐप, सोशल मीडिया पोस्ट या वीडियो—को ब्लॉक कर सकती है। यह कार्रवाई तब की जाती है जब संबंधित कंटेंट को देश की संप्रभुता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या विदेशी संबंधों के लिए खतरा माना जाता है।
क्या बदलने जा रहा है?
वर्तमान में कंटेंट ब्लॉक करने की प्रक्रिया मुख्य रूप से एक निर्धारित मंत्रालय के माध्यम से संचालित होती है। लेकिन नए प्रस्ताव के तहत गृह, रक्षा, विदेश और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सहित कई विभागों को सीधे इस कार्रवाई का अधिकार देने की योजना है। इससे किसी भी विभाग को आपत्तिजनक लगने वाले कंटेंट पर तत्काल कार्रवाई संभव हो सकेगी।
सरकार का पक्ष
सरकार का मानना है कि डिजिटल युग में फेक न्यूज, भ्रामक सूचनाएं और भड़काऊ सामग्री तेजी से फैलती हैं। कई बार कार्रवाई में देरी से हालात बिगड़ जाते हैं। ऐसे में अधिक मंत्रालयों को अधिकार देने से निर्णय प्रक्रिया तेज होगी और नुकसान को समय रहते रोका जा सकेगा।
कंटेंट ब्लॉक करने की प्रक्रिया
आमतौर पर किसी कंटेंट के खिलाफ शिकायत मिलने या उसके संज्ञान में आने के बाद संबंधित अधिकारी उसकी जांच करते हैं। यदि मामला गंभीर पाया जाता है, तो उसे ब्लॉक करने का आदेश जारी किया जाता है। संवेदनशील मामलों में तत्काल कार्रवाई भी की जा सकती है। इसके बाद एक समीक्षा प्रक्रिया भी होती है, जिससे निर्णय की वैधता सुनिश्चित की जा सके।
बढ़ती चिंताएं
इस प्रस्ताव को लेकर नागरिक समाज, डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों के बीच चिंता भी बढ़ी है। उनका कहना है कि यदि कई मंत्रालयों को यह अधिकार मिल जाता है, तो इसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ सकती है। आलोचनात्मक या असहमति वाले विचारों को भी “खतरा” मानकर हटाया जा सकता है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
पहले भी उठे हैं सवाल
धारा 69A के तहत पहले भी कई बार पूरे प्लेटफॉर्म, अकाउंट या चैनल ब्लॉक किए जाने पर विवाद हो चुका है। पारदर्शिता की कमी और निर्णय प्रक्रिया को लेकर कई मामलों में अदालतों का दरवाजा खटखटाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
साल 2015 में Shreya Singhal vs Union of India मामले में Supreme Court of India ने आईटी एक्ट की धारा 66A को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। अदालत ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया था। हालांकि, धारा 69A को कोर्ट ने बरकरार रखा, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि कंटेंट ब्लॉकिंग की प्रक्रिया पारदर्शी, तर्कसंगत और उचित होनी चाहिए।
आगे क्या?
यदि प्रस्तावित बदलाव लागू होते हैं, तो आने वाले समय में इंटरनेट पर कंटेंट नियंत्रण और अधिक सख्त हो सकता है। इससे एक ओर फेक न्यूज और भ्रामक सामग्री पर लगाम लग सकती है, वहीं दूसरी ओर यह भी महत्वपूर्ण होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक अंकुश न लगे।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—डिजिटल युग में “सुरक्षा” और “आज़ादी” के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए? यही बहस आने वाले दिनों में नीति निर्माण का केंद्र बन सकती है।
_edited.jpg)



टिप्पणियां