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आत्म-संदेह ही सफलता की सबसे बड़ी बाधा, सजगता से पाएँ मन पर विजय : निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज

  • लेखक की तस्वीर: धन्नाराम चौधरी
    धन्नाराम चौधरी
  • 4 अग॰
  • 2 मिनट पठन
Bald shirtless man speaks into a microphone on a blue stage backdrop, gesturing with one hand, serious and focused.

ज्ञानोदय परिसर, बेंगलुरु में ‘Psychology of Transformation’ प्रवचन श्रृंखला में आत्मविश्वास, सजगता और सकारात्मक चिंतन का दिया प्रेरक संदेश

भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)| बेंगलुरु | 3 अगस्त, 2026 आत्म-संदेह ही सफलता की सबसे बड़ी बाधा—यह प्रेरक संदेश देते हुए आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने कहा कि जीवन में व्यक्ति की सबसे बड़ी चुनौती बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उसके मन में छिपा आत्म-संदेह है। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य सजगता, सकारात्मक चिंतन और अनुशासित जीवनशैली को अपनाए तो वह न केवल अपने मानसिक तनाव पर विजय प्राप्त कर सकता है, बल्कि सफलता और आत्मविकास के नए आयाम भी स्थापित कर सकता है।


तुबरहल्ली स्थित ज्ञानोदय परिसर (इनर रिफ्लेक्शन सेंटर) में आयोजित "Psychology of Transformation" प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत मुनिश्री ने आधुनिक मनोविज्ञान और जैन दर्शन का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करते हुए बताया कि मनुष्य के विचार ही उसके व्यक्तित्व, व्यवहार और भविष्य का निर्माण करते हैं।


उन्होंने कहा कि आज अधिकांश लोग सफलता, समृद्धि और मानसिक शांति की कामना करते हैं, लेकिन मन के भीतर बैठे भय, असफलता की आशंका और आत्म-संदेह उनके मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन जाते हैं। जब व्यक्ति स्वयं पर विश्वास खो देता है, तब उसकी निर्णय क्षमता, एकाग्रता और कार्य करने की ऊर्जा भी प्रभावित होने लगती है।


Large group of men sit cross-legged on a hall floor, listening attentively during an indoor gathering; chairs and stage in back.

मुनिश्री ने कहा कि आत्म-संदेह को समाप्त करने का सबसे प्रभावी उपाय सजगता (Mindfulness) है। सजगता का अर्थ है—वर्तमान क्षण में पूरी जागरूकता के साथ जीना। उन्होंने बताया कि सजग श्वास, सजग भोजन, ध्यान और आत्मचिंतन जैसे सरल अभ्यास मन को स्थिर बनाते हैं तथा नकारात्मक विचारों पर नियंत्रण पाने में सहायता करते हैं।


उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि सकारात्मक कल्पना (Positive Visualization), प्रेरणादायक साहित्य का अध्ययन, नियमित व्यायाम तथा प्रतिदिन सकारात्मक संकल्पों का अभ्यास व्यक्ति के आत्मविश्वास को मजबूत बनाता है। इन अभ्यासों से मन की नकारात्मकता धीरे-धीरे समाप्त होती है और व्यक्ति अपने लक्ष्य की ओर अधिक दृढ़ता से आगे बढ़ता है।


प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने अनासक्त भाव का भी विशेष महत्व बताया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने पुरुषार्थ और कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पित रहना चाहिए, लेकिन परिणाम के प्रति अत्यधिक आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। यही दृष्टिकोण मानसिक तनाव को कम करता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है और जीवन में स्थिरता प्रदान करता है।


Large seated crowd of women and a few men in colorful traditional dress listening in a bright hall

उन्होंने कहा कि जैन दर्शन केवल मोक्ष का मार्ग नहीं बताता, बल्कि यह दैनिक जीवन में मानसिक संतुलन, आत्मानुशासन, सकारात्मक सोच और सफल जीवन जीने की व्यवहारिक शिक्षा भी प्रदान करता है। यदि व्यक्ति अपने विचार, व्यवहार और जागरूकता को एक दिशा में ले आए, तो उसका जीवन स्वतः परिवर्तन की ओर अग्रसर हो जाता है।


अपने प्रेरक संदेश में मुनिश्री ने कहा, "मनुष्य की उपलब्धियों के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बाहर नहीं, उसके अपने मन का आत्म-संदेह है। जब विचार, आचरण और जागरूकता वर्तमान क्षण में एक हो जाते हैं, तभी व्यक्ति अपने जीवन का सचेत निर्माण कर पाता है।"


प्रवचन के समापन पर श्रद्धालुओं ने आत्मविश्वास, आत्मअनुशासन और सकारात्मक जीवनशैली अपनाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, युवा, महिलाएँ और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग उपस्थित रहे।

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