top of page
भारतार्थ-logo

अहिल्या उद्धार से धनुषभंग तक, मिथिला में गूंजा श्रीराम का पराक्रम

  • लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
    Ashok kumar Singh
  • 4 घंटे पहले
  • 4 मिनट पठन
मंच पर सफेद वस्त्र में वक्ता हाथ उठाकर बोलते हुए, पीछे गणेश चित्र व गुब्बारे; नीचे Nikon Z50_2, 110mm, f/6.3
छाया चित्र-किशोर दफ्तरी

भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 5 सितंबर 2026। पैलेस ग्राउंड, गेट नंबर-9 पर 1 से 7 सितंबर तक आयोजित सात दिवसीय श्रीराम कथा के पांचवें दिन भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। कथा व्यास परम पूज्य श्री राजन जी महाराज ने भगवान श्रीराम के बक्सर से मिथिला प्रस्थान, अहिल्या उद्धार, जनकपुर आगमन, श्रीराम-सीता के प्रथम दर्शन, सीता जी की माता पार्वती से प्रार्थना, शिवधनुष यज्ञ, धनुषभंग और सीता-राम विवाह की तैयारियों का भावपूर्ण वर्णन किया।


कथा के दौरान अहिल्या उद्धार का प्रसंग श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण रहा। श्री राजन जी महाराज ने बताया कि महर्षि विश्वामित्र के साथ मिथिला जाते समय भगवान श्रीराम एक उजड़े स्थान पर पहुंचे। वहां शिला के रूप में पड़ी माता अहिल्या की कथा विश्वामित्र जी ने उन्हें सुनाई। भगवान श्रीराम की चरण-रज के स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ। महाराज जी ने इस प्रसंग से संदेश दिया कि मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में दोषारोपण करने के बजाय ईश्वर की इच्छा, अपने कर्म और धैर्य पर विश्वास रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रभु की भक्ति के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग आवश्यक नहीं है। गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी व्यक्ति भगवान का स्मरण, सेवा और भजन कर सकता है।

छाया चित्र-किशोर दफ्तरी
छाया चित्र-किशोर दफ्तरी

मिथिला में हुआ श्रीराम-लक्ष्मण का भव्य स्वागत


अहिल्या उद्धार के बाद भगवान श्रीराम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ मिथिला पहुंचे। भगवान के आगमन का समाचार मिलने पर राजा जनक स्वयं उनका स्वागत करने पहुंचे। श्रीराम और लक्ष्मण के दिव्य स्वरूप को देखकर राजा जनक भाव-विभोर हो उठे। विश्वामित्र जी ने उन्हें दोनों राजकुमारों का परिचय देते हुए बताया कि वे अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं।

गुरु की आज्ञा लेकर श्रीराम और लक्ष्मण जनकपुर भ्रमण के लिए निकले। दोनों राजकुमारों के नगर में आने का समाचार फैलते ही उन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में नर-नारी उमड़ पड़े। कथा पंडाल में इस प्रसंग के दौरान भक्तिमय भजन “श्री दशरथ राजकुमार, नजर तोहे लग जाएगी” की प्रस्तुति ने वातावरण को भावपूर्ण बना दिया।


श्रीराम के प्रथम दर्शन से भाव-विभोर हुईं सीता


जनकपुर में भगवान श्रीराम के दर्शन से माता सीता भी भाव-विभोर हो उठीं। उन्होंने माता पार्वती से अपने मन की मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना की। इस प्रसंग पर भक्तिमय स्तुति-गान से कथा पंडाल भक्तिरस में डूब गया। महाराज जी ने श्रीराम और सीता के प्रथम मिलन के प्रसंग के माध्यम से श्रद्धा, विश्वास और ईश्वर के प्रति समर्पण का महत्व बताया।

शिवधनुष के सामने विफल हुए अनेक राजा

छाया चित्र-किशोर दफ्तरी
छाया चित्र-किशोर दफ्तरी

इसके बाद कथा शिवधनुष यज्ञ के प्रसंग पर पहुंची। राजा जनक ने घोषणा की कि जो भगवान शिव के पिनाक धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसका भंग करेगा, वही माता सीता का वरण करेगा। सभा में मौजूद अनेक राजा-महाराजाओं ने धनुष उठाने का प्रयास किया, लेकिन कोई उसे हिला तक नहीं सका।

सभी राजाओं की असफलता के बाद राजा जनक ने भावुक होकर कहा कि क्या धरती वीरों से खाली हो गई है। यह सुनकर लक्ष्मण जी क्रोधित हो उठे। उन्होंने रघुवंश की वीरता का स्मरण कराते हुए राजा जनक के कथन पर आपत्ति जताई।

भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण जी को शांत करते हुए कहा कि वे यहां धनुष देखने आए हैं, उसे तोड़ने नहीं। इसके बाद महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को धनुष उठाने और उसका भंग करने की आज्ञा दी।


गुरु की आज्ञा पर श्रीराम ने किया शिवधनुष भंग


महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा मिलते ही भगवान श्रीराम धनुष की ओर बढ़े। सभा में उपस्थित सभी लोगों की निगाहें श्रीराम पर टिक गईं। माता सीता मन ही मन प्रभु से प्रार्थना कर रही थीं, जबकि माता सुनयना भी इस क्षण को लेकर चिंतित थीं। भगवान श्रीराम ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए शिवधनुष का भंग कर दिया। धनुष टूटते ही पूरी सभा जयघोष से गूंज उठी। इस प्रसंग ने कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया।


धनुषभंग के बाद मिथिला में छाया विवाह का उत्सव


शिवधनुष भंग के साथ माता सीता और भगवान श्रीराम के विवाह का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके बाद अयोध्या से राजा दशरथ अपने पुत्रों भरत और शत्रुघ्न सहित मिथिला पहुंचे। दोनों राजपरिवारों में विवाह की तैयारियां शुरू हुईं और मिथिला नगरी उत्सव के रंग में रंग गई। विवाह प्रसंग के दौरान राजा जनक द्वारा भगवान श्रीराम के चरण पखारने का वर्णन सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। कथा पंडाल “सियावर रामचंद्र की जय” और “जय श्रीराम” के जयघोष से गूंजता रहा।

छाया चित्र-किशोर दफ्तरी
छाया चित्र-किशोर दफ्तरी

कथा से मिला मर्यादा और समर्पण का संदेश


श्री राजन जी महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम का चरित्र केवल कथा सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में अपनाने की प्रेरणा है। अहिल्या प्रसंग क्षमा और स्वीकार्यता का संदेश देता है, श्रीराम-लक्ष्मण का आचरण गुरु आज्ञा के पालन की प्रेरणा देता है, सीता जी की प्रार्थना श्रद्धा का प्रतीक है और शिवधनुष भंग पुरुषार्थ तथा मर्यादा का संदेश देता है।

पैलेस ग्राउंड के गेट नंबर-9 पर चल रही श्रीराम कथा में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। 1 सितंबर से शुरू हुई यह कथा 7 सितंबर 2026 तक चलेगी।


आयोजन व्यवस्था में इनकी रही महत्वपूर्ण भूमिका


कार्यक्रम के सफल आयोजन की व्यवस्था में शैलेश मिश्रा, रोहित उपाध्याय, धीरज राज, आदेश, गौरी मिश्रा, प्रवीण पांडेय, अंजनी ओझा, आशुतोष ओझा, गोपाल ओझा, अंकित उपाध्याय और नीतीश मिश्रा सहित आयोजन समिति के सदस्यों ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।


पांचवें दिन आयोजित रामकथा में माननीय श्री सिरीसानंद, माननीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री आशीष राय, समाजवादी पार्टी के प्रदेश सचिव श्री अखिलेश चौबे तथा कर्नाटक के एनडीआरएफ प्रमुख मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।


टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें
bottom of page