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अहंकार छोड़िए, शांति पाइए: मुनि श्री वीर सागर ने बताए 3 सूत्र

  • लेखक की तस्वीर: धन्नाराम चौधरी
    धन्नाराम चौधरी
  • 10 अग॰
  • 4 मिनट पठन

सम्राट अशोक के प्रसंग से समझाया अहंकार का सच; श्रेष्ठ संगति, विनम्रता और तुलना छोड़कर प्रेरणा लेने का दिया प्रभावी संदेश


मंच पर बिना शर्ट के व्यक्ति माइक्रोफोन पर बोलते, पीछे मंदिर-जैसा भव्य बैकड्रॉप; नीचे फाइल फोटो लिखा है

मुनि श्री 108 वीर सागर महाराज प्रवचन करते हुए

भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु | 09 अगस्त 2026 बेंगलुरु। अहंकार मनुष्य की आत्मिक शांति और आत्मविकास का सबसे बड़ा अवरोध बन सकता है। निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीर सागर महाराज ने रविवार को प्रेरणादायी प्रवचन में अहंकार से मुक्ति का सरल और व्यावहारिक मार्ग बताते हुए कहा कि शरीर, पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेना मनुष्य की बड़ी भूल है। इसी मिथ्या पहचान से ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव जन्म लेता है और धीरे-धीरे अहंकार व्यक्ति के विचार, व्यवहार और संबंधों को प्रभावित करने लगता है।


मुनि श्री ने कहा कि अहंकार दिखाई नहीं देता, लेकिन उसका प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र में नजर आ सकता है। परिवार हो, कार्यस्थल हो या सामाजिक जीवन—जब व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा और अधिकार के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है, तो वह दूसरों से लगातार सम्मान, स्वीकृति और वर्चस्व की अपेक्षा करने लगता है। यही अपेक्षाएं आगे चलकर तनाव, असंतोष और मानसिक अशांति का कारण बनती हैं।


सम्राट अशोक की खोपड़ी के प्रसंग से समझाया अहंकार का मूल्य


अहंकार की निरर्थकता समझाने के लिए मुनि श्री वीर सागर महाराज ने सम्राट अशोक से जुड़ा प्रेरक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि कलिंग युद्ध के बाद भारी जनहानि से व्यथित सम्राट अशोक एक मुनिराज के चरणों में विनम्रतापूर्वक झुके। यह देखकर उनके प्रधानमंत्री ने प्रश्न किया कि इतना शक्तिशाली सम्राट एक साधु के सामने क्यों झुक रहा है।


इसके बाद सम्राट अशोक ने पशुओं के सिर और एक मानव खोपड़ी लेकर बाजार में बेचने का निर्देश दिया। पशुओं के सिर के बदले मूल्य मिला, लेकिन मानव खोपड़ी को कोई खरीदने के लिए तैयार नहीं हुआ।

मुनि श्री ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि जिस शरीर और पहचान को लेकर मनुष्य जीवनभर पद, प्रतिष्ठा और अहंकार खड़ा करता है, मृत्यु के बाद उसी शरीर का कोई स्थायी मूल्य नहीं रह जाता। इसलिए क्षणभंगुर शरीर और प्रतिष्ठा के लिए जीवनभर अहंकार पालना वास्तविक बुद्धिमत्ता नहीं है।


अहंकार से मुक्ति के 3 प्रभावी सूत्र


अहंकार को मानसिक बोझ समझकर त्यागें


मुनि श्री ने कहा कि अहंकार से मुक्ति की पहली सीढ़ी अपनी मानसिकता बदलना है। जिस प्रकार घर का कचरा बाहर निकालने के बाद मनुष्य स्वयं को हल्का और स्वच्छ महसूस करता है, उसी प्रकार अहंकार को जीवन से निकालने पर मन में हल्कापन और शांति आती है।

अहंकार को अपनी वास्तविक पहचान मानने के बजाय अनावश्यक मानसिक बोझ समझना जरूरी है। जब व्यक्ति यह समझने लगता है कि पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति और शरीर स्थायी नहीं हैं, तब ‘मैं’ और ‘मेरा’ का आग्रह धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।


गुणाधिक संगति अपनाएं


मुनि श्री वीर सागर महाराज ने दूसरे चरण के रूप में गुणाधिक संगति को महत्वपूर्ण बताया। आचार्य कुंदकुंद के प्रवचनसार का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने से अधिक गुणवान, विनम्र, सदाचारी और श्रेष्ठ संस्कारों वाले लोगों की संगति करनी चाहिए।


मन जिस वातावरण में रहता है, वहां के विचार और संस्कार उस पर प्रभाव डालते हैं। इसलिए श्रेष्ठ व्यक्तियों का साथ व्यक्ति के भीतर भी श्रेष्ठ गुणों, विनम्रता और सदाचार के विकास का माध्यम बन सकता है।


तुलना नहीं, प्रेरणा लें


अहंकार से मुक्ति का तीसरा महत्वपूर्ण सूत्र बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि दूसरों से होने वाली नकारात्मक तुलना को समाप्त करना चाहिए।

किसी व्यक्ति को देखकर स्वयं को श्रेष्ठ समझना भी अहंकार है और स्वयं को हीन समझना भी उचित नहीं है। दूसरों के गुणों को देखकर उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए और अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए।

तुलना का उद्देश्य किसी को छोटा और स्वयं को बड़ा साबित करना नहीं, बल्कि स्वयं में सुधार लाना होना चाहिए।


कार्यस्थल और नेतृत्व में भी खतरनाक है अहंकार


मुनि श्री ने कार्यस्थल और नेतृत्व में अहंकार के प्रभावों को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अहंकार से प्रभावित व्यक्ति अपने निर्णयों पर सवाल या सुझाव सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता। इससे टीम में मतभेद, तनाव और निर्णय लेने में कठिनाई पैदा हो सकती है।

उन्होंने सुझाव दिया कि किसी वरिष्ठ या अधिकार संपन्न व्यक्ति के सामने सुधारात्मक सुझाव रखते समय सीधे उसकी गलती बताने के बजाय विभिन्न विकल्पों के लाभ और सीमाएं सामने रखनी चाहिए। इससे सामने वाले व्यक्ति को अपनी गरिमा बनाए रखते हुए बेहतर निर्णय लेने का अवसर मिलता है।


श्रेष्ठता नहीं, करुणा है वास्तविक आध्यात्मिकता


मुनि श्री ने करुणा और श्रेष्ठता-बोध के बीच अंतर समझाते हुए कहा कि आध्यात्मिक परिपक्वता का अर्थ स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझना नहीं है।

जिन लोगों में कम गुण, कम संसाधन या कम क्षमताएं दिखाई देती हैं, उनके प्रति तिरस्कार के बजाय करुणा का भाव रखना चाहिए। वास्तविक श्रेष्ठता दूसरों को छोटा समझने में नहीं, बल्कि अपने भीतर विनम्रता, करुणा और सद्गुणों को विकसित करने में है।


उन्होंने कहा कि अहंकार बढ़ने के साथ व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होता जाता है। इसके विपरीत शरीर, पद और प्रतिष्ठा के प्रति आसक्ति कम करने, श्रेष्ठ संगति अपनाने और दूसरों से तुलना के बजाय प्रेरणा लेने से व्यक्ति के भीतर शांति, विनम्रता और आत्मबोध का विकास होता है।


मुनि श्री का संदेश स्पष्ट रहा—अहंकार को छोड़ना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मिक शक्ति की पहचान है। जब ‘मैं’ का बोझ कम होता है, तब मनुष्य के भीतर शांति और आत्मिक स्वतंत्रता का मार्ग खुलता है।

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