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Know Your Mind: अपने मन को जानें, जीवन बदलें — मुनि श्री 108 वीर सागर महाराज का प्रेरक संदेश

  • लेखक की तस्वीर: धन्नाराम चौधरी
    धन्नाराम चौधरी
  • 23 जुल॰
  • 3 मिनट पठन

चातुर्मास प्रवचन में आत्म-निरीक्षण, सकारात्मक सोच और जीवन रूपांतरण का दिया व्यावहारिक सूत्र


Two bare-chested monks speak at microphones on a stage, with a temple backdrop and ornate tan columns behind them.

मुनि श्री 108 वीर सागर महाराज चातुर्मास प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए।

भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) | बेंगलुरु | 23 जुलाई, 2026 Know Your Mind (अपने मन को जानो)—यही जीवन परिवर्तन का सबसे बड़ा मंत्र है। श्री ज्ञानोदय दिगंबर जैन मंदिर, तुबरहल्ली में आयोजित चातुर्मास प्रवचनमाला के दौरान पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीर सागर महाराज ससंघ ने श्रद्धालुओं को आत्म-निरीक्षण, सकारात्मक दृष्टिकोण और मन की शक्ति का गहरा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन की अधिकांश समस्याओं का समाधान बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने मन के भीतर छिपा होता है। यदि व्यक्ति अपने मन को समझना सीख जाए तो उसका जीवन, परिवार और समाज स्वतः बदलने लगता है।


मुनि श्री ने कहा कि संसार को बदलने का प्रयास करने से पहले स्वयं को बदलना आवश्यक है। व्यक्ति के विचार, दृष्टिकोण और मन की स्थिति ही उसके जीवन की दिशा तय करते हैं। उन्होंने आचार्य कुंदकुंद देव के अमूल्य वचन "जो एकम जानदि सो सब्वं जानदि" का उल्लेख करते हुए कहा कि जो स्वयं को जान लेता है, वह संपूर्ण जीवन के सत्य को समझ लेता है।


उन्होंने कहा कि मन आत्मा तक पहुँचने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन अपने मन का निरीक्षण करना चाहिए। यदि मन सकारात्मक होगा तो परिस्थितियाँ भी सकारात्मक दिखाई देंगी।


प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने महाभारत का अत्यंत प्रेरक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि जब दुर्योधन को अच्छे व्यक्ति की खोज करने भेजा गया तो उसे कोई अच्छा नहीं मिला, जबकि युधिष्ठिर को बुरे व्यक्ति की खोज करने पर भी कोई बुरा नहीं मिला। इससे स्पष्ट होता है कि संसार वैसा नहीं है जैसा वह वास्तव में है, बल्कि वैसा दिखाई देता है जैसी हमारी दृष्टि होती है। उन्होंने कहा कि "जब दृष्टि बदलती है, तभी सृष्टि बदलती हुई प्रतीत होती है।"


जीवन रूपांतरण को सरल भाषा में समझाते हुए उन्होंने अंडे का उदाहरण दिया। यदि अंडा बाहर से टूटता है तो जीवन समाप्त हो जाता है, लेकिन यदि वही अंडा भीतर से टूटता है तो एक नए जीवन की शुरुआत होती है। इसी प्रकार वास्तविक परिवर्तन भी भीतर से प्रारंभ होता है। बाहरी परिवर्तन अस्थायी होते हैं, जबकि आंतरिक परिवर्तन व्यक्ति के पूरे जीवन को नई दिशा देता है।


मुनि श्री ने कहा कि अधिकांश लोग अपना समय दूसरों की कमियाँ खोजने और उन्हें सुधारने में व्यतीत कर देते हैं, जबकि स्वयं के दोषों को देखने का प्रयास नहीं करते। जब व्यक्ति स्वयं को स्वीकार करना, स्वयं से प्रेम करना और निष्पक्ष आत्म-विश्लेषण करना सीख जाता है, तभी उसके भीतर क्षमा, करुणा, सहनशीलता और सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है।


उन्होंने श्रद्धालुओं से प्रतिदिन रात्रि में पाँच से दस मिनट आत्म-निरीक्षण करने का संकल्प लेने का आह्वान किया। दिनभर के विचारों, व्यवहार और निर्णयों की समीक्षा करते हुए अपने भीतर के "युधिष्ठिर" और "दुर्योधन" को पहचानने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन कुछ मिनट अपने मन को समझने में लगाए तो परिवार, समाज और राष्ट्र में सकारात्मक परिवर्तन स्वतः दिखाई देने लगेगा।


ज्ञानोदय परिवार जैन समाज द्वारा आयोजित इस आध्यात्मिक प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। मुनि श्री का "Know Your Mind – अपने मन को जानो" संदेश केवल धार्मिक उपदेश नहीं बल्कि आधुनिक जीवन के लिए आत्म-विकास, मानसिक शांति और व्यक्तित्व निर्माण का प्रभावशाली मार्गदर्शन बनकर उभरा।

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Vipin Kumar Jain
Vipin Kumar Jain
27 जुल॰
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