30 दिन जेल में रहे तो जाएगी कुर्सी? नए कानून की चर्चा से सियासत गरम
- धन्नाराम चौधरी

- 2 जुल॰
- 2 मिनट पठन

PM-CM हटाने वाले कथित संविधान संशोधन बिल को लेकर राजनीतिक हलकों में तेज हुई बहस, सरकार और विपक्ष आमने-सामने
भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) नई दिल्ली | 2 जुलाई, 2026 देश की राजनीति में इन दिनों एक संभावित संविधान संशोधन विधेयक को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। राजनीतिक सूत्रों और सोशल मीडिया पर वायरल दावों के अनुसार, केंद्र सरकार आगामी मानसून सत्र में ऐसा प्रस्तावित कानून ला सकती है, जिसके तहत किसी गंभीर मामले में 30 दिनों तक जेल या न्यायिक हिरासत में रहने वाले मंत्री, मुख्यमंत्री (CM) या प्रधानमंत्री (PM) को अपने पद से हटना पड़ सकता है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक इस तरह के किसी विधेयक की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
बताया जा रहा है कि कथित “130वां संविधान संशोधन विधेयक” राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। सोशल मीडिया और विभिन्न राजनीतिक चर्चाओं में दावा किया जा रहा है कि यह कानून गंभीर अपराधों में आरोपित जनप्रतिनिधियों पर लागू हो सकता है। हालांकि संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी जनप्रतिनिधि को केवल हिरासत के आधार पर पद से हटाना एक जटिल संवैधानिक प्रक्रिया है और इसके लिए संसद में व्यापक बहस तथा कानूनी परीक्षण आवश्यक होगा।
सूत्रों के मुताबिक, इस प्रस्तावित कानून में ऐसे मामलों को शामिल करने की चर्चा है, जिनमें पांच वर्ष या उससे अधिक सजा का प्रावधान हो। साथ ही यदि कोई जनप्रतिनिधि लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसके पद पर बने रहने को लेकर कानूनी प्रक्रिया शुरू हो सकती है। हालांकि इन दावों पर अब तक सरकार या संसद की ओर से कोई औपचारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भविष्य में ऐसा कोई विधेयक आता है, तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति से लेकर राज्यों की सत्ता तक देखने को मिल सकता है। विपक्षी दलों का कहना है कि ऐसे किसी कानून का दुरुपयोग राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ किया जा सकता है। वहीं सत्तापक्ष के समर्थकों का तर्क है कि राजनीति को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाने के लिए कठोर नियम जरूरी हैं।
संसद के आगामी मानसून सत्र को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। सत्ता और विपक्ष दोनों अपने-अपने स्तर पर रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं। यदि ऐसा कोई विधेयक संसद में पेश होता है, तो लोकसभा और राज्यसभा में इसे पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी, जो सरकार के लिए आसान चुनौती नहीं मानी जा रही।
विशेषज्ञों का कहना है कि संविधान संशोधन से जुड़े किसी भी कानून का सीधा असर लोकतांत्रिक व्यवस्था, संघीय ढांचे और न्यायिक प्रक्रिया पर पड़ सकता है। ऐसे में इस मुद्दे पर देशभर में बड़ी राजनीतिक और कानूनी बहस देखने को मिल सकती है।
_edited.jpg)



टिप्पणियां