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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

20अक्टूबर /2026 /मंगलवार

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

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15 दस्तावेज भी नहीं बचा सके! हाई कोर्ट ने शख्स को माना विदेशी

लेखक की तस्वीर: धन्नाराम चौधरी
धन्नाराम चौधरी
2 जुल॰
2 मिनट पठन
Seven adults review paperwork around a table in a modest room, discussing documents amid wooden chairs and barred windows.

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल का फैसला बरकरार रखा, PAN और वोटर ID समेत कई दस्तावेज ठुकराए

भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) गुवाहाटी | 2 जुलाई, 2026 असम में नागरिकता से जुड़े मामलों के बीच गुवाहाटी हाई कोर्ट का एक अहम फैसला सुर्खियों में आ गया है। अदालत ने एक व्यक्ति द्वारा पेश किए गए 15 दस्तावेजों को भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें उसे विदेशी घोषित किया गया था। इस फैसले ने एक बार फिर नागरिकता, दस्तावेजों की वैधता और कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर देशभर में बहस छेड़ दी है।


गुवाहाटी हाई कोर्ट की जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की बेंच ने याचिकाकर्ता की अपील खारिज करते हुए कहा कि वह विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के तहत अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने में असफल रहा। अदालत ने स्पष्ट किया कि विदेशी होने के आरोप वाले मामलों में व्यक्ति पर ही यह जिम्मेदारी होती है कि वह खुद को भारतीय नागरिक साबित करे।


मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, याचिकाकर्ता असम का रहने वाला एक दिहाड़ी मजदूर है, जिसका जन्म 1 मई 1988 को घुगुदोबा क्षेत्र में हुआ था। उसने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 1951 के NRC रिकॉर्ड, विभिन्न वर्षों की वोटर लिस्ट, जमीन के दस्तावेज, स्कूल प्रमाणपत्र, PAN कार्ड और वोटर आईडी कार्ड सहित कुल 15 दस्तावेज अदालत के सामने पेश किए थे।


हालांकि अदालत ने इन दस्तावेजों में कई विसंगतियों और तकनीकी कमियों का हवाला देते हुए उन्हें पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि PAN कार्ड और EPIC (वोटर आईडी) भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं हैं। वहीं कुछ दस्तावेजों में नामों की स्पेलिंग, जन्मतिथि और पारिवारिक विवरणों में अंतर पाए गए, जिससे दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए।


याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि दस्तावेजों में मामूली स्पेलिंग त्रुटियां आम बात हैं और इन्हें आधार बनाकर किसी को विदेशी घोषित करना उचित नहीं है। इसके बावजूद अदालत ने मौखिक गवाही और पारिवारिक बयान को पर्याप्त सबूत मानने से इनकार कर दिया।


कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला नागरिकता मामलों में दस्तावेजों की शुद्धता और रिकॉर्ड की कानूनी वैधता को लेकर एक बड़ा संदेश देता है। साथ ही यह मामला असम में NRC और नागरिकता विवाद से जुड़ी संवेदनशीलता को भी फिर से चर्चा में ले आया है।

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