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वीर शासन जयंती पर मुनि श्री वीर सागर जी महाराज का प्रेरक संदेश: "जो स्वयं को जीतकर लोककल्याण में समर्पित हो, वही सच्चा शासक"

  • लेखक की तस्वीर: धन्नाराम चौधरी
    धन्नाराम चौधरी
  • 30 जुल॰
  • 2 मिनट पठन
Two monks speak at microphones on a stage with a sky-blue backdrop and Hindi text reading 2026, serious and formal.

ज्ञानोदय परिसर में विशेष धर्मसभा, भगवान महावीर के आत्मविजय, अहिंसा और लोककल्याण आधारित शासन का बताया वास्तविक स्वरूप

भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) बेंगलुरु | 30 जुलाई, 2026 बेंगलुरु। वीर शासन जयंती के पावन अवसर पर ज्ञानोदय परिसर (इनर रिफ्लेक्शन सेंटर), तुबरहल्ली में परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीर सागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में आयोजित विशेष धर्मसभा श्रद्धा, आध्यात्मिक ऊर्जा और प्रेरणादायी विचारों से ओत-प्रोत रही। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भगवान महावीर के शासन, आत्मविजय और लोककल्याण के संदेश को आत्मसात करने का संकल्प लिया। वीर शासन जयंती का यह आयोजन आध्यात्मिक चेतना, नैतिक नेतृत्व और मानवीय मूल्यों का प्रेरक केंद्र बन गया।


अपने उद्बोधन में मुनि श्री वीर सागर जी महाराज ने कहा कि भगवान महावीर का शासन किसी राजसत्ता, भय, हिंसा या बल पर आधारित नहीं था, बल्कि आत्मसंयम, अहिंसा, करुणा, निस्वार्थ सेवा और लोककल्याण पर आधारित था। उन्होंने कहा कि सामान्य शासक दूसरों पर अधिकार स्थापित करके शासन करते हैं, जबकि भगवान महावीर ने अपने भीतर के अहंकार, लोभ, क्रोध और भय पर विजय प्राप्त कर समस्त जीवों के हृदय में स्थान बनाया। यही वास्तविक विजय है और यही सच्चा शासन है।


मुनि श्री ने कहा कि ढाई हजार वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भगवान महावीर का जिनशासन आज भी मानवता को सत्य, संयम और मोक्षमार्ग की दिशा दिखा रहा है। यह शासन किसी सीमित भूभाग का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक है।


उन्होंने स्पष्ट किया कि वास्तविक नेतृत्व वह नहीं है जो लोगों को भयभीत कर अपनी बात मनवाए, बल्कि वह है जिसे लोग उसके श्रेष्ठ आचरण, त्याग, सेवा और करुणा के कारण स्वेच्छा से स्वीकार करें। परिवार, समाज, संस्था या राष्ट्र—हर स्तर पर नेतृत्व करने वाले व्यक्ति को पहले स्वयं को अनुशासित बनाना होगा। आत्मविजय के बिना नेतृत्व अधूरा है।


धर्मसभा में मुनि श्री ने तीर्थंकर भगवान और सामान्य केवलियों के बीच का अंतर भी सरल शब्दों में स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि केवल आत्मकल्याण प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। तीर्थंकर भगवान सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए धर्म, देव, गुरु और शास्त्र की ऐसी परंपरा स्थापित करते हैं, जिससे अनंत जीवों को मोक्षमार्ग प्राप्त होता है। भगवान महावीर की दिव्यध्वनि और उनके द्वारा स्थापित जिनशासन आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।


मुनि श्री ने कहा कि वीर शासन जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का अवसर है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अहिंसा, आत्मसंयम, सत्य, निस्वार्थ सेवा और परोपकार को अपनाए, तभी भगवान महावीर के शासन की वास्तविक भावना जीवंत रह सकेगी।


उन्होंने श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि आधुनिक जीवन की चुनौतियों के बीच भी यदि व्यक्ति अपने भीतर की बुराइयों पर विजय प्राप्त कर ले, तो वह स्वयं, परिवार और समाज—तीनों के लिए प्रेरणा बन सकता है। यही भगवान महावीर के शासन का मूल संदेश है।


धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भगवान महावीर के आदर्शों को जीवन में अपनाने, अहिंसा एवं करुणा का प्रचार-प्रसार करने तथा समाज में नैतिक मूल्यों को मजबूत बनाने का सामूहिक संकल्प लिया।

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