विदेश में एकता, देश में सवाल: हरिप्रसाद ने RSS से मांगा जवाब
- धन्नाराम चौधरी

- 4 दिन पहले
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भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com बेंगलुरु, 31 अगस्त 2026। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस समिति (केपीसीसी) के अध्यक्ष बी. के. हरिप्रसाद ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के न्यूयॉर्क में दिए गए धार्मिक एकता संबंधी बयान का उल्लेख करते हुए संघ की विचारधारा और देश के भीतर अल्पसंख्यकों को लेकर बन रहे राजनीतिक माहौल पर सवाल उठाए हैं।
हरिप्रसाद ने कहा कि मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में आयोजित एक अंतरधार्मिक संवाद के दौरान कहा था कि जो व्यक्ति भारत में मुसलमानों के न रहने की इच्छा रखता है, वह सच्चा हिंदू नहीं हो सकता। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, भागवत ने ‘वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी’ कार्यक्रम में धार्मिक विविधता, मानव गरिमा और विभिन्न आस्थाओं के प्रति सम्मान की बात कही थी।
हरिप्रसाद ने इस बयान का स्वागत करते हुए प्रश्न उठाया कि यदि आरएसएस की सोच सभी धर्मों और समुदायों के प्रति समान सम्मान की है, तो भारत के भीतर अल्पसंख्यकों को लेकर राजनीतिक ध्रुवीकरण और अविश्वास के आरोप बार-बार क्यों सामने आते हैं।
उन्होंने कहा कि विदेशों में हिंदू-मुस्लिम एकता और धार्मिक सद्भाव का संदेश दिया जाना महत्वपूर्ण है, लेकिन ऐसे संदेशों की वास्तविक विश्वसनीयता तब और मजबूत होती है, जब उनका प्रभाव देश की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में भी दिखाई दे।
संविधान की भावना का दिया हवाला
हरिप्रसाद ने भारतीय संविधान का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समान संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है। उनके अनुसार किसी भी नागरिक को धर्म के आधार पर कमतर समझने वाली सोच संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार सभी नागरिकों के अधिकारों की समान सुरक्षा है और सरकार तथा राजनीतिक संगठनों की जिम्मेदारी समाज में सभी समुदायों के बीच विश्वास और समानता का वातावरण बनाए रखना है।
राजनीतिक ध्रुवीकरण पर उठाए सवाल
केपीसीसी अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि देश में धार्मिक पहचान को राजनीतिक विमर्श का प्रमुख विषय बनाए जाने से सामाजिक और आर्थिक न्याय के मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं।
उन्होंने कहा कि दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों ने ऐतिहासिक रूप से शिक्षा, रोजगार, संपत्ति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के क्षेत्रों में असमानताओं का सामना किया है। संविधान ने इन ऐतिहासिक चुनौतियों के समाधान के लिए आरक्षण, समान अवसर और सामाजिक न्याय जैसे प्रावधान किए हैं।
हरिप्रसाद के अनुसार, जब सार्वजनिक बहस का केंद्र सामाजिक न्याय के बजाय बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की धार्मिक पहचान बन जाती है, तब समाज के वंचित वर्गों से जुड़े बुनियादी मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
वाजपेयी से जुड़ी पुरानी घटना का उल्लेख
अपने बयान में हरिप्रसाद ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विदेश मंत्री रहने के दौरान कोलंबो में हुई एक कथित घटना का भी उल्लेख किया। वरिष्ठ पत्रकार बी. आर. पी. भास्कर द्वारा अपने संस्मरणों में वर्णित एक प्रसंग के अनुसार, एक भोज के दौरान वाजपेयी से एक व्यंजन को लेकर सवाल किया गया था, जिस पर उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि यह भारतीय गाय का मांस नहीं है। इस प्रसंग का उल्लेख वर्षों बाद भास्कर के संस्मरणों के आधार पर प्रकाशित रिपोर्टों में हुआ है।
हरिप्रसाद ने कहा कि इस प्रकार के प्रसंगों को किसी व्यक्ति की निजी खान-पान की पसंद के संदर्भ में अलग ढंग से देखा जा सकता है, लेकिन जब धार्मिक प्रतीकों और आस्थाओं का उपयोग राजनीतिक विमर्श में किया जाता है, तब सार्वजनिक जीवन में कथनी और व्यवहार के बीच समानता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
‘कथनी और व्यवहार में समानता जरूरी’
हरिप्रसाद ने कहा कि मोहन भागवत के न्यूयॉर्क संदेश को केवल एक भाषण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसकी कसौटी भारत के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में दिखाई देने वाले व्यवहार पर भी होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि सभी धर्मों और समुदायों के प्रति समान सम्मान का संदेश वास्तविक है, तो देश के भीतर भी मुस्लिम, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के बीच सुरक्षा, विश्वास और समानता का वातावरण मजबूत होना चाहिए।
हालांकि, आरएसएस स्वयं को किसी भी समुदाय के विरोधी संगठन के रूप में स्वीकार नहीं करता है और विभिन्न अवसरों पर संगठन के नेताओं ने सामाजिक समरसता तथा सभी समुदायों के साथ संवाद की बात कही है। मोहन भागवत के हालिया न्यूयॉर्क संबोधन में भी उन्होंने कहा कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए, ऐसा मानने वाला व्यक्ति हिंदू होने के मूल भाव से दूर हो जाता है।
भारतीयता को प्राथमिक पहचान बनाने की अपील
हरिप्रसाद ने कहा कि संविधान की दृष्टि में नागरिक की प्राथमिक पहचान भारतीय नागरिक के रूप में है और राज्य का दायित्व किसी एक धार्मिक समुदाय की भावनाओं को प्राथमिकता देना नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की समान रूप से रक्षा करना है।
उन्होंने कहा कि धार्मिक विविधता भारत की ऐतिहासिक और सामाजिक शक्ति रही है। इसलिए राजनीतिक और सामाजिक संगठनों को ऐसी भाषा और व्यवहार अपनाना चाहिए, जिससे समाज में भाईचारा, विश्वास और समान नागरिकता की भावना मजबूत हो।
विदेशी मंचों का संदेश भारत में भी दिखे
हरिप्रसाद ने अपने बयान में कहा कि विदेशों में धार्मिक एकता और मानवता का संदेश देना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार, ऐसे संदेशों की वास्तविक परीक्षा देश के भीतर सामाजिक व्यवहार और राजनीतिक वातावरण में होती है।
उन्होंने कहा कि भारत की सड़कों, गांवों, शहरों और राजनीतिक विमर्श में भी वही एकता और भाईचारे की भाषा दिखाई देनी चाहिए, जिसकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर की जाती है।
उन्होंने आरएसएस और उससे जुड़े राजनीतिक विमर्श से जुड़े लोगों से आग्रह किया कि धार्मिक पहचान के आधार पर विभाजन की राजनीति से ऊपर उठकर संविधान, सामाजिक न्याय, समान नागरिक अधिकार और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता दी जाए।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मोहन भागवत के न्यूयॉर्क संबोधन के बाद धार्मिक सह-अस्तित्व, आरएसएस की विचारधारा और भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो सकती है। इस बहस में विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों के विचार अलग-अलग हैं, जबकि सभी पक्षों के लिए संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सद्भाव को केंद्र में रखना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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