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रहस्य और आस्था का संगम: बिहार का वो गांव, जो साल में एक दिन हो जाता है पूरी तरह खाली

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 27 अप्रैल
  • 3 मिनट पठन
“साल में एक दिन पूरा गांव जंगल में बिताता है समय” naurangiya-village-forest-tradition.jpg
“साल में एक दिन पूरा गांव जंगल में बिताता है समय” naurangiya-village-forest-tradition.jpg

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

बिहार| क्या आपने कभी ऐसा गांव देखा है, जहां एक ही दिन में पूरा इलाका वीरान हो जाए? बिहार के बगहा स्थित नौरंगिया गांव में हर साल सीता नवमी पर एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है—पूरा गांव 12 घंटे के लिए घर छोड़ जंगल में बस जाता है। यह रहस्यमयी परंपरा न सिर्फ आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामूहिक एकता और सांस्कृतिक विरासत की अद्भुत मिसाल भी है। इस अनोखे “वनवास उत्सव” के पीछे छिपी कहानी, धार्मिक मान्यताएं और सामाजिक संदेश आज पूरे देश का ध्यान खींच रहे है।

बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के बगहा क्षेत्र में स्थित नौरंगिया गांव आज देशभर में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। वजह है यहां निभाई जाने वाली एक अद्भुत और रहस्यमयी परंपरा, जिसमें साल में एक दिन पूरा गांव अपने घरों को ताला लगाकर जंगल में चला जाता है। यह परंपरा हर वर्ष बैसाख शुक्ल नवमी, यानी सीता नवमी के दिन निभाई जाती है। सुबह की पहली किरण के साथ ही गांव की गलियां सूनी हो जाती हैं। घरों के दरवाजों पर ताले लटक जाते हैं और हजारों ग्रामीण एक साथ जंगल की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। यह दृश्य किसी फिल्मी कहानी जैसा प्रतीत होता है, लेकिन नौरंगिया गांव में यह सदियों से चली आ रही सच्चाई है।

कैसे शुरू हुई यह अनोखी परंपरा?

ग्रामीणों के अनुसार, दशकों पहले गांव में हैजा, चेचक जैसी घातक बीमारियों और प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप था। लोग भय और असुरक्षा के माहौल में जी रहे थे। उसी दौरान एक सिद्ध संत गांव आए, जिन्होंने वनदेवी की पूजा और साल में एक दिन सामूहिक वनवास का उपाय सुझाया। ग्रामीणों ने पूरे विश्वास के साथ इस परंपरा को अपनाया। आश्चर्यजनक रूप से इसके बाद गांव में शांति और समृद्धि का दौर शुरू हुआ। तब से यह परंपरा बिना किसी बाधा के निरंतर जारी है।


 “नौरंगिया गांव के लोग सीता नवमी पर जंगल की ओर जाते हुए”
 “नौरंगिया गांव के लोग सीता नवमी पर जंगल की ओर जाते हुए”

जंगल में बसता है ‘एक दिन का संसार’

सीता नवमी के दिन गांव के लोग वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के जंगलों में स्थित “भजनी कुट्टी” पहुंचते हैं। यहां वनदेवी की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। पूरा दिन भक्ति, प्रकृति और सामूहिक जीवन के रंग में रंगा रहता है।परिवार एक साथ बैठकर वनभोज करते हैं, धार्मिक गीत गाते हैं और प्रकृति के साथ जुड़ाव महसूस करते हैं। यह परंपरा माता सीता के वनवास के प्रति सम्मान के रूप में भी देखी जाती है।

नई पीढ़ी भी निभा रही है परंपरा

आज के आधुनिक दौर में जहां परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं, वहीं नौरंगिया गांव की नई पीढ़ी इस विरासत को पूरे गर्व के साथ आगे बढ़ा रही है। युवा इसे अपनी पहचान मानते हैं और पूरे उत्साह के साथ इसमें भाग लेते हैं।

सामाजिक एकता की मिसाल

यह परंपरा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और अनुशासन का अनूठा उदाहरण है। पूरे गांव का एक साथ एक नियम का पालन करना, सामूहिक विश्वास और सांस्कृतिक मजबूती को दर्शाता है।

आपके मन में उठ रहे सवाल?

क्या यह परंपरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी फायदेमंद हो सकती है?

क्या सामूहिक वनवास सामाजिक एकता को मजबूत करता है?

क्या आधुनिक समाज में ऐसी परंपराएं प्रासंगिक हैं?

क्या यह परंपरा पर्यटन का नया केंद्र बन सकती है?

हाल ही में इस परंपरा की चर्चा ने देशभर में हलचल मचा दी है और हर नागरिक के मन में ऐसे कई सवाल उठ रहे हैं।

Q1. नौरंगिया गांव कहां स्थित है?

Q2. यह परंपरा कब निभाई जाती है?

Q3. लोग गांव क्यों छोड़ते हैं?

Q4. क्या इस दौरान गांव में कोई रहता है?

अब आपकी बारी!

इन सभी सवालों पर अपनी राय और जवाब नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। आपकी सोच ही लोकतंत्र की ताकत है।

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