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 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

20अक्टूबर /2026 /मंगलवार

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

अलुवा,19 अक्टूबर 2026। कभी-कभी जीवन में सुनी गई कोई बात या देखा गया कोई वीडियो सोचने का नजरिया बदल देता है। केरल की अरुंधति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक वीडियो से प्रेरित अरुंधति ने उन्हें हाथ से लिखा भावुक पत्र भेजकर अपनी शादी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। उनकी शादी 20 दिसंबर 2026 को केरल के अलुवा में होनी है।

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भील समाज के काला बावजी और जैनों के आदिनाथ भगवान एक ही हैं—इतिहास क्या कहता है?

लेखक की तस्वीर: Ashok kumar Singh
Ashok kumar Singh
4 दिन पहले
2 मिनट पठन
बैंगनी शर्ट पहने व्यक्ति बांस की कुर्सी पर बैठा है, सुनहरे कमल-फ्रेम में, घर के पर्दों वाले कमरे में शांति से।

प्रस्तुतकर्ता: नीरज सिंघवी, जोधपुर से मोटीवेशन मास्टर्स - नीरज सिंघवी (Bhaarataarth.com)

राजस्थान के मेवाड़, उदयपुर, ऋषभदेव, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, राजसमंद क्षेत्र में भील समाज आदिनाथ भगवान को काला बावजी, कालाजी कहकर पूजा करता है, और जैन समाज केसरियाजी / ऋषभदेव जी कहता है। मूर्ति एक ही है, नाम अनेक।


1. धुलेव का इतिहास


आज जिसे हम ऋषभदेव / केसरियाजी तीर्थ कहते हैं, उसका प्राचीन नाम धुलेव है। यह नाम वहाँ के भील सरदार धूला भील के नाम पर पड़ा। इतिहास कहता है—अरावली की कोयल नदी के किनारे, घने जंगल में यह काले पाषाण की विशाल प्रतिमा थी। इस मूर्ति की नींव और रक्षा स्थानीय भील समाज ने ही की। मुस्लिम आक्रमणों और लुटेरों से इस मंदिर को धूला भील और उसके साथियों ने बचाया। इसलिए इस नगर का नाम धुलेव पड़ा।

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2. काला बावजी क्यों कहते हैं?


मूर्ति का पाषाण एकदम काला, कसौटी जैसा है, इसलिए भील समाज प्यार से काला बावजी कहता है।

वही मूर्ति पर जब जैन और वैष्णव भक्त मनौती के लिए केसर चढ़ाते हैं तो केसर से मूर्ति केसरिया रंग की दिखती है, इसलिए केसरियाजी नाम पड़ा। एक ही मूर्ति—एक के लिए काला बावजी, दूसरे के लिए केसरियाजी।


3. भील समाज के कुलदेवता


भील समाज के मसार और अहारी गोत्र के भीलों के कुलदेवता ही काला बावजी हैं। आज भी ऋषभदेव में शादी, नया घर, खेती से पहले काला बावजी की मान ली जाती है। बच्चे का जन्म हो तो पहले बावजी के दर्शन।

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4. मेवाड़ का राजतिलक और भील


इतिहास में यह भी दर्ज है—मेवाड़ के महाराणाओं का राजतिलक भील सरदार के खून से होता था। हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के साथ पूंजा भील ने साथ दिया था। इसलिए मेवाड़ में भील कभी अलग नहीं रहे, वे इस धरती के मूल रक्षक हैं।


5. आस्था का संगम


यह तीर्थ ऐसा है जहाँ जैन, भील, मीणा, वैष्णव, सब एक साथ पूजा करते हैं। भील अगरबत्ती नहीं, केसर चढ़ाता है, नारियल फोड़ता है, और कहता है—"मारो कालो बावजी सबकी रक्षा करे।" यह मूर्ति बताती है कि धर्म ने कभी बांटा नहीं, जोड़ा है। भगवान एक है, हम सब उसी के बेटे हैं।


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संपादकीय नोट: प्रस्तुत सामग्री प्रेषक के मूल आलेख के वर्णित ऐतिहासिक दावों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया गया है।

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