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बिहार में मंत्रिमंडल विस्तार पर मंथन तेज, सम्राट चौधरी की दिल्ली मुलाकातें बनीं सियासी संकेत

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 22
  • 3 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

पटना/नई दिल्ली। बिहार की राजनीति में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हालिया दिल्ली दौरे और शीर्ष नेतृत्व से उनकी मुलाकातों ने सियासी अटकलों को और मजबूत कर दिया है। माना जा रहा है कि राज्य में जल्द ही मंत्रिपरिषद के विस्तार की घोषणा हो सकती है, जिसमें कुछ नए चेहरों को मौका मिलने की संभावना है।

दिल्ली दौरे से बढ़ी चर्चा

मुख्यमंत्री बनने के बाद सम्राट चौधरी की यह पहली दिल्ली यात्रा मानी जा रही है। इस दौरान उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शिष्टाचार भेंट हुई और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के साथ संगठनात्मक मुद्दों पर भी चर्चा की बात सामने आई है। राजनीतिक हलकों में इसे केवल औपचारिक मुलाकात नहीं, बल्कि आगामी मंत्रिमंडल विस्तार की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। बिहार की सत्ता में भाजपा की भूमिका पहले से ही मजबूत रही है, लेकिन नए समीकरणों में संतुलन साधना सरकार के लिए अहम चुनौती है। सूत्रों के मुताबिक, नेतृत्व यह सुनिश्चित करना चाहता है कि जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन बना रहे।

संभावित नामों पर नजर

मंत्रिमंडल में जगह पाने की दौड़ में भाजपा, जदयू और सहयोगी दलों के कई वरिष्ठ और प्रभावशाली नाम चर्चा में हैं। भाजपा खेमे से मंगल पांडेय, रामकृपाल यादव, दिलीप जायसवाल, श्रेयसी सिंह, लखेंद्र पासवान, रमा निषाद, प्रमोद कुमार चंद्रवंशी, अरुण शंकर प्रसाद और संजय सिंह ‘टाइगर’ जैसे नामों की चर्चा है। जदयू कोटे से विजय कुमार चौधरी, विजेंद्र प्रसाद यादव, श्रवण कुमार, अशोक चौधरी, लेसी सिंह, मदन सहनी, जमा खां और सुनील कुमार संभावित दावेदार बताए जा रहे हैं। वहीं सहयोगी दलों की ओर से संतोष कुमार सुमन, संजय पासवान, संजय कुमार सिंह और दीपक प्रकाश के नाम सामने आए हैं।

पुराने दावेदारों की दहलीज

विजय कुमार सिन्हा और जीवेश कुमार जैसे नेताओं को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। विजय कुमार सिन्हा पहले विधानसभा अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री जैसे अहम पदों पर रह चुके हैं, इसलिए उनके लिए संगठन या सरकार में कोई बड़ी जिम्मेदारी तय होने की संभावना जताई जा रही है।

इसी तरह जीवेश कुमार, जो लगातार तीन बार जाले सीट से विजयी रहे हैं और पिछली सरकार में प्रभावशाली मंत्री भी रह चुके हैं, इस समय मंत्रिमंडल से बाहर हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जातीय संतुलन और क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर उनके भविष्य पर फैसला होगा।

जातीय संतुलन की चुनौती

बिहार में मंत्रिमंडल गठन हमेशा केवल संख्या का खेल नहीं रहा, बल्कि यह जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कवायद भी रहा है। ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, यादव, कुर्मी, दलित और अतिपिछड़े वर्गों के बीच प्रतिनिधित्व का फॉर्मूला तय करना हर सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, अगर किसी एक समूह को अधिक प्राथमिकता दी गई तो असंतोष पैदा हो सकता है। इसी वजह से केंद्रीय नेतृत्व की सहमति को अंतिम निर्णय में निर्णायक माना जा रहा है।

अमित शाह का बयान

इस पूरे घटनाक्रम के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का चुनावी बयान भी चर्चा में है, जिसमें उन्होंने कहा था, “आप इन्हें जिताइए, हम इन्हें और बड़ा आदमी बना देंगे।” अब सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने को उसी वादे की आंशिक पूर्ति के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में यह सवाल बना हुआ है कि जिन अन्य नेताओं के लिए यह संकेत दिया गया था, उनके लिए आगे क्या भूमि का तय होगी। यही कारण है कि मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर उत्सुकता और भी बढ़ गई है।


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