top of page

 भारतार्थ खबर, नहीं उसका अर्थ

21अक्टूबर /2026 /बुधवार

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

भारतार्थ लोगो: खबर नहीं, उसका अर्थ - राजनीतिक समाचार विश्लेषण

बेंगलुरु, 20 अक्टूबर 2026। बेंगलुरु में आयोजित 48वें दशहरा महोत्सव में राज्यसभा सांसद लहर सिंह सिरोया ने मां दुर्गा के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और आशीर्वाद प्राप्त किया। सिद्धार्थ सांस्कृतिक समिति एवं राजेंद्र बाबू मेमोरियल ट्रस्ट ‘बिहार भवन’ के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में सांसद की उपस्थिति रही। इस अवसर पर समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने मां भगवती की चुनड़ी ओढ़ाकर उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

WhatsApp Video 2026-10-04 at 8.50.36 PM.mp4

बंजर जमीन से समृद्धि तक: राजस्थान के इस गांव में पॉलीहाउस खेती ने बदली किसानों की तकदीर

लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
धन्ना राम चौधरी
12 घंटे पहले
3 मिनट पठन
राजस्थान के गुढ़ा खुमावतन गांव में पॉलीहाउस, ड्रिप सिंचाई और वर्षा जल संरक्षण से आधुनिक खेती करते किसान।

भारतार्थ खबर Bhaarataarth.com जयपुर, 20 अक्टूबर 2026। राजस्थान में पानी की कमी और बंजर जमीन को खेती की बड़ी बाधा माना जाता है, लेकिन जयपुर के पास स्थित गुढ़ा खुमावतन गांव ने आधुनिक कृषि तकनीकों के सहारे नई संभावनाएं पैदा की हैं। यहां पॉलीहाउस, बूंद-बूंद सिंचाई और वर्षा जल संरक्षण जैसी पद्धतियों को अपनाकर किसान पारंपरिक खेती से आगे बढ़ रहे हैं। इसी बदलाव के कारण इस गांव को ‘करोड़पति किसानों का गांव’ और ‘मिनी इजरायल’ जैसे नामों से भी पहचाना जाने लगा है। हालांकि, गांव के करीब 500 किसानों के करोड़पति होने और खेती से असाधारण कमाई के दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। फिर भी यहां संरक्षित खेती और जल प्रबंधन को लेकर सामने आई जानकारी सूखे क्षेत्रों में कृषि के नए विकल्पों की ओर ध्यान आकर्षित करती है।


इजरायली तकनीक से मिली आधुनिक खेती को दिशा


रिपोर्टों के अनुसार, करीब 10 से 12 वर्ष पहले तक गुढ़ा खुमावतन के अधिकांश किसान पारंपरिक खेती पर निर्भर थे। क्षेत्र में पानी की कमी बड़ी समस्या थी। जमीन में गहराई पर उपलब्ध पानी के खारे होने से सिंचाई भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई थी। ऐसे हालात में कुछ किसानों ने आधुनिक तकनीकों की ओर रुख किया और पॉलीहाउस के जरिए संरक्षित खेती की शुरुआत की।


बताया जाता है कि किसान खेमाराम ने इजरायल की कृषि तकनीकों से प्रेरणा लेकर गांव में शुरुआती पॉलीहाउस स्थापित किया। उन्होंने इसमें शिमला मिर्च की खेती की और दावा किया जाता है कि महज तीन महीने में उन्हें करीब 13 लाख रुपये की फसल प्राप्त हुई। इस प्रयोग ने स्थानीय किसानों के बीच संरक्षित खेती के प्रति रुचि बढ़ाने में भूमिका निभाई। पॉलीहाउस में नियंत्रित वातावरण के कारण फसलों को प्रतिकूल मौसम से बचाने और उत्पादन की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसमें शुरुआती निवेश, रखरखाव, बाजार की मांग और फसल के उचित मूल्य जैसे पहलुओं का ध्यान रखना भी जरूरी है।


बारिश की हर बूंद बचाने पर जोर


पानी की सीमित उपलब्धता के बीच गांव के किसानों ने वर्षा जल संरक्षण को खेती की रणनीति का अहम हिस्सा बनाया है। जानकारी के मुताबिक, यहां खेतों में फार्म पॉन्ड यानी जलकुंड बनाए गए हैं, जिनमें बारिश का पानी जमा किया जाता है। जरूरत के समय इस पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाता है। इसके साथ ही ड्रिप इरिगेशन यानी बूंद-बूंद सिंचाई तकनीक का उपयोग भी महत्वपूर्ण है। इस पद्धति में पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है, जिससे अनावश्यक जल खर्च कम करने में मदद मिलती है। पानी का नियोजित इस्तेमाल, फसल का चयन और आधुनिक कृषि तकनीक मिलकर कम पानी वाले क्षेत्रों में उत्पादन की संभावनाएं बढ़ा सकते हैं।


पॉलीहाउस विस्तार की योजना


गांव के एक किसान के हवाले से बताया गया है कि सरकार की ओर से पॉलीहाउस लगाने के लिए सब्सिडी उपलब्ध कराई जा रही है और करीब 1,200 नए पॉलीहाउस स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, इस लक्ष्य, सब्सिडी की शर्तों और क्रियान्वयन की स्थिति की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।


एक किसान ने अपनी आर्थिक यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि उनके पास करीब चार हेक्टेयर पुश्तैनी जमीन थी, जिसमें से उनके हिस्से में लगभग 18 बीघा जमीन आई। शुरुआती दौर में उन पर 10 से 20 लाख रुपये तक का कर्ज होने की बात भी सामने आई है। अब वे खेती का विस्तार कर अधिक आय अर्जित करने की योजना बना रहे हैं। किसानों के विदेशों में जाकर नई कृषि तकनीकों को देखने-समझने की जानकारी भी सामने आई है। इनमें थाईलैंड में हाइड्रोपोनिक और एक्वापोनिक जैसी पद्धतियों का अध्ययन शामिल बताया गया है। इन तकनीकों में मिट्टी के बिना पोषक घोल के माध्यम से पौधे उगाने तथा जल-आधारित प्रणालियों में मछली पालन और पौधों की खेती को जोड़ने जैसे प्रयोग किए जाते हैं।


खेती से बढ़ी आमदनी, लेकिन जोखिम भी बरकरार


गुढ़ा खुमावतन की चर्चा किसानों की बेहतर आर्थिक स्थिति और आधुनिक जीवनशैली को लेकर भी होती है। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि गांव के लगभग 500 किसान करोड़पति बन चुके हैं। उनके पास महंगी गाड़ियों और आलीशान फार्महाउस होने की बात भी कही जाती है। किसान बाबूलाल के हवाले से यह दावा भी सामने आया है कि उनकी खेती से होने वाली कमाई पेट्रोल पंप की आमदनी से अधिक है।


हालांकि, ऐसे दावों का मूल्यांकन करते समय यह समझना जरूरी है कि खेती की कमाई और शुद्ध मुनाफा अलग-अलग होते हैं। बीज, पौध, खाद, तकनीक, बिजली, श्रम, परिवहन, कर्ज और बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव पर वास्तविक लाभ निर्भर करता है। इसलिए गांव के सभी किसानों की आर्थिक स्थिति को एक जैसा मानना उचित नहीं होगा। गुढ़ा खुमावतन का अनुभव यह संकेत देता है कि सही तकनीक, पानी का बेहतर प्रबंधन, प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच खेती को अधिक लाभकारी बनाने में मदद कर सकते हैं। इस मॉडल की व्यापक सफलता के लिए किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, वित्तीय सहायता, फसल बीमा और उपज के उचित मूल्य की व्यवस्था भी जरूरी है।



टिप्पणियां

5 स्टार में से 0 रेटिंग दी गई।
अभी तक कोई रेटिंग नहीं

रेटिंग जोड़ें
bottom of page