गुरु पूर्णिमा पर मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज का प्रेरक संदेश, आत्मजागरण और संयम का दिखाया मार्ग
- धन्नाराम चौधरी

- 29 जुल॰
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आत्म-सिलिकॉन वर्षायोग (चातुर्मास) 2026 में गुरु-शिष्य परंपरा, स्वाध्याय, आत्मचिंतन और जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों पर दिया प्रेरणादायी मंगल प्रवचन।

ज्ञानोदय परिसर, तुबरहल्ली, बेंगलुरु में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज का मंगल प्रवचन।
भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) | बेंगलुरु | 29 जुलाई, 2026 गुरु पूर्णिमा पर मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज के प्रेरणादायी संदेश ने बेंगलुरु में आयोजित आत्म-सिलिकॉन वर्षायोग (चातुर्मास) 2026 को आध्यात्मिक चेतना का विराट मंच बना दिया। ज्ञानोदय परिसर, तुबरहल्ली स्थित इनर रिफ्लेक्शन सेंटर में आयोजित मंगल प्रवचन में संतों, विद्वानों तथा हजारों श्रद्धालुओं की गरिमामयी उपस्थिति रही। अपने ओजस्वी एवं व्यावहारिक उद्बोधन में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज ने गुरु-शिष्य परंपरा, आत्मजागरण, स्वाध्याय, संयम और आधुनिक जीवन में आध्यात्मिक अनुशासन की आवश्यकता पर गहन विचार व्यक्त किए।

मुनि श्री ने कहा कि गुरु केवल पूजनीय व्यक्तित्व नहीं, बल्कि आत्मा में सुप्त चेतना को जागृत करने वाले दिव्य प्रेरणा-स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि सच्ची गुरु भक्ति केवल पूजा, वंदना या अनुष्ठानों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसका उद्देश्य व्यक्ति के जीवन में आत्मपरिवर्तन, चरित्र निर्माण और सदाचार का विकास होना चाहिए।

उन्होंने वर्तमान सूचना-प्रधान युग का उल्लेख करते हुए कहा कि आज ज्ञान के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं, लेकिन जीवन में शांति, संतुलन और आत्मिक स्थिरता का अभाव दिखाई देता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शास्त्रों का अध्ययन तभी सार्थक है, जब वह गुरु के मार्गदर्शन और नियमित स्वाध्याय के माध्यम से व्यवहारिक जीवन में उतरकर व्यक्ति के विचार, व्यवहार और चरित्र को श्रेष्ठ बनाए।
प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य और अपरिग्रह जैसे जैन धर्म के मूल सिद्धांतों को आधुनिक जीवन में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि परिवार, समाज, व्यवसाय और व्यक्तिगत जीवन में संयमित आचरण, मर्यादित उपभोग, मधुर वाणी तथा आत्मसंयम ही स्थायी मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन का आधार हैं।

गुरु पूर्णिमा के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल उत्सव मनाने का दिन नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षण और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ अवसर है। प्रत्येक व्यक्ति को बीते वर्ष के अपने आचरण का निष्पक्ष मूल्यांकन करना चाहिए तथा क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों का त्याग कर सेवा, करुणा, स्वाध्याय और आत्मसाधना को अपने दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाना चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि गुरु के उपदेशों को केवल सुनें नहीं, बल्कि उन्हें व्यवहार में उतारें। जीवन में अनुशासन, विनम्रता और आत्मचिंतन अपनाकर ही सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक प्रगति संभव है। गुरु का सम्मान तभी सार्थक है जब उनका संदेश हमारे विचारों और आचरण में दिखाई दे।
ज्ञानोदय परिसर में आयोजित चार माह के आत्म-सिलिकॉन वर्षायोग (चातुर्मास) 2026 के दौरान प्रतिदिन मंगल प्रवचन, प्रैक्टिकल समाधान, ध्यान, स्वाध्याय, शंका समाधान, युवा प्रेरणा शिविर तथा जैन आगमों पर विशेष अध्ययन सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों में देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु, विद्यार्थी एवं युवा सहभागिता कर रहे हैं।
निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज, आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज की आध्यात्मिक परंपरा के वरिष्ठ संत हैं। अपने तार्किक चिंतन, सरल अभिव्यक्ति और व्यावहारिक दृष्टिकोण के माध्यम से वे जैन दर्शन को समकालीन जीवन से जोड़ते हुए समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान कर रहे हैं। उनकी 'प्रैक्टिकल समाधान' तथा 'Psychology of Transformation' जैसी प्रवचन श्रृंखलाएँ विशेष रूप से युवाओं और बुद्धिजीवियों के बीच लोकप्रिय हैं।
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