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केरल में परंपरा बनाम इतिहास, किसकी होगी जीत?

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 2 days ago
  • 3 min read

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

तिरुवनंतपुरम। केरल विधानसभा चुनाव एक बार फिर राज्य की राजनीति के सबसे बड़े सवाल के साथ सामने है—क्या मतदाता सत्ता परिवर्तन की दशकों पुरानी परंपरा को कायम रखेंगे या फिर मौजूदा सरकार को लगातार तीसरी बार चुनकर नया इतिहास रचेंगे? इस बार का मुकाबला न केवल दो प्रमुख गठबंधनों के बीच है, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों और उभरती नई ताकतों के कारण भी बेहद दिलचस्प हो गया है।


राज्य की राजनीति लंबे समय से दो ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूमती रही है—लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ)। एलडीएफ का नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के हाथ में है, जबकि यूडीएफ की कमान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस संभालती है। परंपरागत रूप से इन दोनों गठबंधनों के बीच हर पांच साल में सत्ता का बदलाव होता रहा है, लेकिन 2021 में इस सिलसिले को तब विराम मिला जब एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की।


सत्ता विरोधी लहर या स्थिर नेतृत्व?

राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि इस बार यूडीएफ के पक्ष में माहौल बन सकता है। एक दशक की सत्ता के बाद एलडीएफ को स्वाभाविक एंटी-इंकम्बेंसी का सामना करना पड़ रहा है। 2024 के लोकसभा चुनावों में यूडीएफ ने 20 में से 18 सीटें जीतकर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। इसके अलावा 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में भी उसके बेहतर प्रदर्शन ने यह संकेत दिया है कि मतदाताओं में बदलाव की इच्छा हो सकती है।

हालांकि, केरल की राजनीति में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के रुझान अक्सर अलग-अलग रहे हैं। पिछले तीन दशकों में कई बार ऐसा हुआ है कि संसद में बेहतर प्रदर्शन करने वाला गठबंधन विधानसभा में वही सफलता दोहरा नहीं पाया। ऐसे में यूडीएफ के लिए यह एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।


आंकड़ों में छिपी जमीनी सच्चाई

विधानसभा चुनावों के आंकड़े मुकाबले को और पेचीदा बनाते हैं। 140 सदस्यीय विधानसभा में एलडीएफ ने 2021 में 99 और 2016 में 91 सीटें जीतकर अपनी मजबूत पकड़ दिखाई थी। हालांकि 2011 में उसे मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। दिलचस्प बात यह है कि 89 सीटें ऐसी हैं जहां पिछले तीन चुनावों से एक ही गठबंधन का वर्चस्व बना हुआ है, जो जमीनी स्तर पर गहरी राजनीतिक जड़ें दर्शाता है।


विजयन की लोकप्रियता बनाम असंतोष

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ ने प्रशासनिक स्थिरता और विश्वसनीयता की छवि बनाई है। बाढ़ और कोविड महामारी जैसी आपदाओं के दौरान उनकी सरकार की सक्रियता को व्यापक सराहना मिली थी। हालांकि दूसरे कार्यकाल में आर्थिक चुनौतियों और प्रशासनिक सुस्ती को लेकर कुछ असंतोष भी उभर रहा है। इसके बावजूद व्यक्तिगत लोकप्रियता के मामले में विजयन अब भी विपक्ष के कई चेहरों पर भारी माने जाते हैं।


बीजेपी की बढ़ती मौजूदगी से बदले समीकरण

इस बार चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की बढ़ती सक्रियता है। लंबे समय तक तीसरे विकल्प के रूप में देखी जाने वाली बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में अपने वोट शेयर में लगातार इजाफा किया है। 2024 में त्रिशूर लोकसभा सीट जीतना और तिरुवनंतपुरम में मजबूत प्रदर्शन करना उसके लिए बड़ी उपलब्धि रही। स्थानीय निकाय चुनावों में तिरुवनंतपुरम मेयर पद पर जीत ने भी यह संकेत दिया है कि पार्टी अब केवल सीमित क्षेत्रों तक सिमटी नहीं है। बीजेपी इस बार पारंपरिक वोट बैंक से आगे बढ़ते हुए ईसाई और अन्य समुदायों में भी अपनी पैठ बनाने की रणनीति पर काम कर रही है।


त्रिकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता चुनाव

केरल में इस बार का चुनाव पारंपरिक द्विध्रुवीय राजनीति से आगे बढ़कर त्रिकोणीय मुकाबले की ओर संकेत कर रहा है। जहां एक ओर यूडीएफ सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है, वहीं एलडीएफ तीसरी बार जीत हासिल कर इतिहास रचने की कोशिश में है। दूसरी ओर बीजेपी का उभरता प्रदर्शन चुनावी गणित को जटिल बना रहा है।


निर्णायक मोड़ पर केरल की राजनीति

कुल मिलाकर, केरल विधानसभा चुनाव 2026 केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं, बल्कि राज्य की राजनीतिक दिशा तय करने वाला निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। मतदाता क्या परंपरा को कायम रखेंगे या स्थिरता को प्राथमिकता देंगे—इसका जवाब चुनाव परिणाम ही देंगे।

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