“एक ही जहाज के मुसाफिर”: डोभाल का एकता संदेश
- धन्ना राम चौधरी

- 24 अप्रैल
- 2 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
नई दिल्ली, 24 अप्रैल। देश की आंतरिक एकता और समावेशी विकास को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल के तहत अजीत डोभाल ने 18 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री कार्यालय में भारतीय मुस्लिम समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक की। करीब डेढ़ घंटे तक चली इस चर्चा में शिक्षा, उद्यमिता, सामाजिक सशक्तिकरण और राष्ट्र निर्माण में भागीदारी जैसे अहम मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श हुआ।
बैठक के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने एक भावनात्मक और दूरदर्शी संदेश देते हुए कहा कि भारत में रहने वाले हिंदू और मुसलमान “एक ही जहाज के मुसाफिर” हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हम या तो साथ तैरेंगे या साथ डूबेंगे,” जो वहां मौजूद प्रतिनिधियों के बीच एकता और साझा भविष्य का मजबूत संदेश बनकर उभरा। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व प्रसिद्ध शिक्षाविद् और उद्योगपति जफर सरेशवाला ने किया। उन्होंने सरकार के समक्ष समुदाय के लिए समान अवसर और भागीदारी की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा कि मुस्लिम समाज अब “नए भारत” के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है। बैठक में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े कई प्रतिष्ठित नाम शामिल रहे। इनमें केपी ग्रुप के चेयरमैन फारुक पटेल, जर्मन स्टील कंपनी के सीएमडी इनामुल राकी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की कुलपति अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की प्रो. नईमा खातून, दाऊदी बोहरा जमात के वरिष्ठ पदाधिकारी अल्ताफ सादिकोट, मीडिया प्रतिनिधि समीना शेख, पर्यावरण कार्यकर्ता सहर भामला, एम्स की गोल्ड मेडलिस्ट डॉ. निशात हुसैन और अंजुमन-ए-इस्लाम के अध्यक्ष डॉ. जहीर काजी सहित कई प्रमुख हस्तियां मौजूद थीं।
सूत्रों के अनुसार, बैठक का उद्देश्य पारंपरिक वोट-बैंक राजनीति से आगे बढ़कर मुस्लिम समुदाय के भीतर शिक्षा, कौशल विकास और उद्यमिता को प्रोत्साहित करना था। एनएसए ने अपने संबोधन में अंग्रेजी और उर्दू के मिश्रण से एक प्रभावशाली संवाद स्थापित किया, जिससे उपस्थित प्रतिनिधियों के साथ सीधा जुड़ाव बना। यह पहल इस बात का संकेत देती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा अब केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि देश के भीतर सामाजिक सामंजस्य, विश्वास और सभी समुदायों के समग्र विकास को भी समान महत्व दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहलें “आत्मनिर्भर भारत” की दिशा में सामाजिक समावेशन को मजबूती देने के साथ-साथ देश की आंतरिक एकता को भी और सुदृढ़ करेंगी।
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