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आतंकवादियों पर किताब विवाद: बेंगलुरु में बवाल, कार्यक्रम रद्द करने की मांग तेज

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Apr 27
  • 2 min read

भारतार्थ खबर, बेंगलुरु संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

बेंगलुरु। बेंगलुरु में एक प्रस्तावित किताब विमोचन कार्यक्रम को लेकर सियासी और सामाजिक हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद पी.सी. मोहन ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन से मांग की है कि 2020 के दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद पर आधारित किताब के विमोचन कार्यक्रम को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए। अपने बयान में उन्होंने इस कार्यक्रम को “राष्ट्रविरोधी सोच को बढ़ावा देने वाला” करार देते हुए कहा कि ऐसे व्यक्तियों को मंच देना न केवल संवेदनशील है बल्कि समाज में गलत संदेश भी दे सकता है।

क्या है पूरा मामला?

डोमलूर स्थित बेंगलुरु इंटरनेशनल सेंटर में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम आयोजित किया जाना प्रस्तावित है, जिसमें प्रमुख हस्तियों के शामिल होने की जानकारी सामने आई है। इनमें अभिनेता प्रकाश राज, इतिहासकार रामचंद्र गुहा और सामाजिक वैज्ञानिक जानकी नायर शामिल बताए जा रहे हैं। इस कार्यक्रम को लेकर विरोध की आवाजें तेज हो गई हैं। सांसद पी.सी. मोहन ने पुलिस आयुक्त से मिलकर कार्यक्रम को अनुमति न देने की अपील की है।

कानूनी और राजनीतिक पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि दिल्ली दंगे 2020 के मामले में उमर खालिद पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोप लगाए गए हैं और वे न्यायिक हिरासत में हैं। इस मामले में कई आरोपियों की जमानत याचिकाएं अदालतों द्वारा खारिज की जा चुकी हैं, जबकि कुछ को राहत भी मिली है। पी.सी. मोहन ने अपने बयान में यह भी कहा कि “जो व्यक्ति अभी जेल में है, उसे ‘महिमामंडित’ करने की क्या आवश्यकता है?”

क्या बोले सांसद?

सांसद ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा:

“आतंकवाद और दंगों से जुड़े आरोपियों पर किताब जारी करना पीड़ितों के साथ अन्याय है। ऐसे आयोजनों से समाज में गलत संदेश जाता है और देश की एकता पर असर पड़ सकता है।” उन्होंने राज्य की कांग्रेस सरकार पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि “ऐसे कार्यक्रमों को अनुमति देना सरकार की नरम नीति को दर्शाता है।”

उठते बड़े सवाल

हालिया घटनाक्रम ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं:

• क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसे कार्यक्रमों की अनुमति दी जानी चाहिए?

• क्या आरोपित व्यक्तियों पर आधारित साहित्य समाज को गुमराह कर सकता है?

• क्या सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए या यह सांस्कृतिक स्वतंत्रता का मामला है?

• क्या ऐसे आयोजनों से पीड़ितों की भावनाएं आहत होती हैं?

Q1. विवाद किस किताब को लेकर है?

Q2. कार्यक्रम कहां आयोजित होना था?

Q3. विरोध क्यों हो रहा है?

Q4. कार्यक्रम में कौन-कौन शामिल होने वाले हैं?

Q5. क्या कार्यक्रम रद्द हुआ है?

अब आपकी बारी!

इस पूरे मुद्दे पर आपकी क्या राय है? क्या ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगनी चाहिए या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए?

👇 नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें। आपकी सोच ही लोकतंत्र की ताकत है।

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