19 साल बाद मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस में बड़ा उलटफेर, सभी दोषी बरी
- धन्नाराम चौधरी

- 11 जुल॰
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हाईकोर्ट ने सबूतों को बताया अपर्याप्त, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रिहाई पर रोक से किया इनकार
भारतार्थ खबर। संवाददाता: धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) मुंबई | 11 जुलाई, 2026 , मुंबई लोकल ट्रेन ब्लास्ट केस में करीब 19 साल बाद बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। 11 जुलाई 2006 को हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में 180 से अधिक लोगों की मौत और 800 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस बहुचर्चित मामले में पहले विशेष MCOCA अदालत ने 5 आरोपियों को फांसी और 7 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, लेकिन अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने सभी दोषियों को बरी कर दिया है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए आरोपियों की रिहाई पर रोक नहीं लगाई है। हालांकि शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि हाईकोर्ट के फैसले को फिलहाल किसी अन्य मामले में कानूनी मिसाल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
करीब दो दशक पुराने इस मामले ने एक बार फिर जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली, साक्ष्यों की गुणवत्ता और भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि कई कथित इकबालिया बयान लगभग एक जैसे थे, जिससे उनकी विश्वसनीयता पर संदेह पैदा होता है। न्यायालय ने हिरासत में प्रताड़ना के आरोपों को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया।
11 जुलाई 2006 की शाम मुंबई की पश्चिमी रेलवे लाइन पर कुछ ही मिनटों के अंतराल में सात लोकल ट्रेनों में विस्फोट हुए थे। यह हमला भारत के सबसे भयावह आतंकी हमलों में गिना जाता है। घटना के बाद महाराष्ट्र ATS ने 28 लोगों को आरोपी बनाया, जिनमें 13 को गिरफ्तार किया गया। जांच के आधार पर 2015 में विशेष अदालत ने दोषसिद्धि का फैसला सुनाया था।
जुलाई 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट की विशेष पीठ ने 667 पन्नों के फैसले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि प्रस्तुत साक्ष्य दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं और MCOCA लगाने के लिए आवश्यक कानूनी आधार भी स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं किए गए।
महाराष्ट्र सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन शीर्ष अदालत ने फिलहाल दोषियों की रिहाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि अंतिम कानूनी स्थिति अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और आगे की सुनवाई के बाद ही इस बहुचर्चित मामले पर अंतिम निर्णय सामने आएगा।
यह मामला केवल एक आतंकी हमले की जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया, निष्पक्ष जांच और विश्वसनीय साक्ष्यों के महत्व पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। देशभर की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं।
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