मुनंबम भूमि विवाद: UMEED पोर्टल पर वक्फ की एंट्री से केरल में बढ़ा तनाव, 600 परिवारों के भविष्य पर सवाल
- धन्ना राम चौधरी

- 27 मई
- 4 मिनट पठन

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)
तिरुवनंतपुरम/एर्नाकुलम, 27 मई। केरल के एर्नाकुलम जिले के मुनंबम क्षेत्र में 404 एकड़ जमीन को लेकर विवाद एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है। केरल राज्य वक्फ बोर्ड द्वारा इस जमीन को केंद्र सरकार के UMEED पोर्टल पर पंजीकृत किए जाने के बाद स्थानीय हिंदू और लैटिन कैथोलिक ईसाई परिवारों में चिंता और आक्रोश बढ़ गया है। मामला फिलहाल वक्फ न्यायाधिकरण और न्यायिक प्रक्रियाओं के अधीन है, लेकिन पोर्टल पर हुए इस पंजीकरण ने राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज कर दी है।
करीब 600 से अधिक परिवार, जो दशकों से इस इलाके में रह रहे हैं, दावा कर रहे हैं कि उन्होंने यह जमीन कानूनी रूप से खरीदी थी और उनके पास स्वामित्व के वैध दस्तावेज मौजूद हैं। दूसरी ओर, वक्फ बोर्ड का कहना है कि वह केवल केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन कर रहा है और संबंधित भूमि 1950 के वक्फ डीड के आधार पर वक्फ संपत्ति मानी जाती है।
क्या है पूरा मुनंबम भूमि विवाद?
एर्नाकुलम जिले के वेलंकन्नी चर्च के आसपास स्थित लगभग 404 एकड़ जमीन को लेकर विवाद तब गहराया जब केरल राज्य वक्फ बोर्ड ने इसे अपनी संपत्ति के रूप में दर्ज करना शुरू किया। स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने यह जमीन फारूक कॉलेज प्रबंधन समिति से खरीदी थी और वर्षों से टैक्स भरते हुए वहां रह रहे हैं।
हालांकि, वक्फ बोर्ड ने 1950 के एक वक्फ विलेख का हवाला देते हुए दावा किया कि यह भूमि धार्मिक ट्रस्ट की संपत्ति है। इसके बाद कई परिवारों को नोटिस मिलने लगे, जिससे लोगों में भय और असुरक्षा की भावना बढ़ गई।
UMEED पोर्टल पर पंजीकरण से क्यों बढ़ा विवाद?
केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया UMEED (Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency and Development) पोर्टल देशभर की वक्फ संपत्तियों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने के लिए बनाया गया है। इसी पोर्टल पर मुनंबम की विवादित जमीन को दर्ज किए जाने से विवाद ने नया मोड़ ले लिया।
मुनंबम भूमि संरक्षण परिषद के संयोजक जोसेफ बेनी ने आरोप लगाया कि यह कदम “मामले को कानूनी रूप से और उलझाने” के उद्देश्य से उठाया गया है। परिषद ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपकर केरल वक्फ बोर्ड को भंग करने की मांग की है।
राजनीतिक बयानबाजी भी तेज
हाल ही में केरल की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन के बाद यह मुद्दा फिर गर्मा गया है। मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने आरोप लगाया कि पिछली सरकार के दौरान गठित वक्फ बोर्ड ने मामले को जानबूझकर जटिल बनाया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सामान्यतः संबंधित वक्फ संपत्ति को मुथावल्ली समुदाय पोर्टल पर पंजीकृत करता है, लेकिन इस मामले में बोर्ड ने खुद पहल की। उन्होंने इसे “दो समुदायों के बीच तनाव पैदा करने का प्रयास” बताया।
वहीं, केरल राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष केएस हम्सा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि बोर्ड केवल केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 17 मई तक सभी वक्फ संपत्तियों को UMEED पोर्टल पर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
चर्च और स्थानीय संगठनों की नाराजगी
कैथोलिक चर्च से जुड़े संगठनों ने इस कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। चर्च समर्थित प्रकाशन ‘दीपिका’ में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि यह केवल 610 परिवारों का मुद्दा नहीं, बल्कि “धर्मनिरपेक्ष केरल की सामाजिक संरचना” से जुड़ा मामला है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जमीन को पूरी तरह वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया गया, तो हजारों लोगों के आशियाने और आजीविका पर संकट आ सकता है।
बीजेपी ने भी उठाए सवाल
भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे को लेकर राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड दोनों पर निशाना साधा है। पार्टी का आरोप है कि हिंदू और ईसाई परिवारों के भूमि अधिकारों की अनदेखी की जा रही है। क्षेत्र में कई संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी किए गए हैं।
भारत में वक्फ संपत्तियों का बड़ा दायरा
अल्पसंख्यक मंत्रालय के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में वक्फ बोर्डों के पास लगभग 8.65 लाख एकड़ अचल संपत्ति दर्ज है। यह दावा किया जाता है कि सेना और रेलवे के बाद देश में सबसे अधिक जमीन वक्फ संस्थाओं के पास है।
2009 में यह आंकड़ा लगभग 4 लाख एकड़ था, जो पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ा है। इसी वजह से वक्फ संपत्तियों को लेकर कई राज्यों में कानूनी और प्रशासनिक विवाद सामने आते रहे हैं।
आपके मन में उठ रहे सवाल | Q&A
Q1. क्या मुनंबम की जमीन पर वक्फ बोर्ड का कब्जा हो गया है?
नहीं। मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया और वक्फ न्यायाधिकरण के अधीन है। अंतिम निर्णय अदालत या संबंधित प्राधिकरण द्वारा होगा।
Q2. UMEED पोर्टल क्या है?
यह केंद्र सरकार का डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जहां देशभर की वक्फ संपत्तियों का रिकॉर्ड और सत्यापन किया जाता है।
Q3. स्थानीय परिवार क्या मांग कर रहे हैं?
परिवारों की मांग है कि उनके स्वामित्व दस्तावेजों को मान्यता दी जाए और उन्हें बेदखल न किया जाए।
Q4. क्या यह केवल धार्मिक विवाद है?
विशेषज्ञों के अनुसार यह कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक तीनों स्तरों का विवाद है, जिसे राजनीतिक रंग भी मिल गया है।
Q5. आगे क्या हो सकता है?
मामले की सुनवाई और दस्तावेजों की जांच के आधार पर न्यायाधिकरण या उच्च अदालतें अंतिम निर्णय ले सकती हैं।
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निष्कर्ष: मुनंबम भूमि विवाद अब केवल जमीन का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह कानूनी अधिकार, धार्मिक संस्थाओं की शक्तियों, डिजिटल भूमि रिकॉर्ड और नागरिक सुरक्षा जैसे कई संवेदनशील प्रश्नों को सामने ला रहा है। आने वाले दिनों में न्यायालय और सरकार की भूमिका इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मामलों में पारदर्शिता, दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच और सामाजिक संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी होगा।
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