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भव्य आयोजन में मनाया गया जिनशासन स्थापना दिवस, उमड़ा श्रद्धा का सैलाब

  • लेखक की तस्वीर: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • 2 मई
  • 3 मिनट पठन
श्री आदिनाथ जैन मंदिर में ध्वज वंदन और धार्मिक कार्यक्रम का दृश्य, jinshasan-sthapna-divas-shivamogga.jpg
श्री आदिनाथ जैन मंदिर में ध्वज वंदन और धार्मिक कार्यक्रम का दृश्य, jinshasan-sthapna-divas-shivamogga.jpg

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com) शिवमोग्गा से विशेष रिपोर्ट

शिवमोग्गा। शिवमोग्गा में आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब श्री आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्ति पूजक संघ के तत्वावधान में जिनशासन स्थापना का 2582वां ऐतिहासिक दिवस अत्यंत श्रद्धा, उल्लास और गरिमा के साथ मनाया गया। वैशाख सुदी एकादशी, सोमवार (27 अप्रैल 2026) को सुबह 10:08 बजे के शुभ मुहूर्त पर आयोजित इस आयोजन ने न केवल धार्मिक चेतना को जागृत किया, बल्कि समाज को अपने मूल्यों से जोड़ने का भी कार्य किया।


सुबह से ही श्री आदिनाथ जैन मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से गूंज उठा। सकल संघ के सदस्य और श्रद्धालु पूजा वस्त्र धारण कर बड़ी संख्या में उपस्थित हुए। जैसे ही शुभ मुहूर्त आया, जिनशासन ध्वज का विधिवत वंदन कर उसे हर्षोल्लास के साथ लहराया गया। पूरा परिसर “वंदे जिनशासन” के जयकारों से गूंज उठा, जिसने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।


यह वही पावन दिवस है जब भगवान महावीर स्वामी ने चतुर्विध संघ—साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका—की स्थापना की थी। इस ऐतिहासिक क्षण ने धर्म के प्रचार-प्रसार और समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना की दिशा में एक नई दिशा प्रदान की। आयोजन के दौरान वक्ताओं ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला कि यदि जिनशासन की स्थापना न हुई होती, तो मानव समाज को धर्म, पुण्य-पाप और जीवन के मूलभूत सिद्धांतों की सही समझ कैसे मिलती।


इस दिन का महत्व केवल संघ स्थापना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वह शुभ अवसर भी है जब पावापुरी नगरी में भगवान महावीर को केवलज्ञान प्राप्त होने के पश्चात समवसरण की दिव्य रचना हुई थी। इसी दिन इन्द्रभूति गौतम सहित 11 गणधरों और 4400 लोगों को दीक्षा देकर साधु बनाया गया। साथ ही चंदनबाला को साध्वी के रूप में दीक्षित किया गया, जो नारी शक्ति और आध्यात्मिकता का अनुपम उदाहरण है।


श्रावक और श्राविकाओं को 12 व्रतों का पालन करने का मार्ग दिखाया गया, जिससे समाज में संयम और सदाचार की भावना मजबूत हुई। प्रभु महावीर के श्रीमुख से निकली त्रिपदी को सुनकर गणधरों ने द्वादशांगी की रचना की, जो आज भी जैन धर्म का आधार स्तंभ मानी जाती है।


कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं ने ध्वज की परिक्रमा कर अपनी आस्था प्रकट की और जिनशासन की महिमा का गुणगान किया। इस अवसर पर उपस्थित भक्तों ने परमात्मा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए अपने जीवन को धर्ममय बनाने का संकल्प लिया।

आपके मन में उठ रहे सवाल?

• क्या आज के आधुनिक युग में जिनशासन के सिद्धांतों का पालन संभव है?

• क्या नई पीढ़ी धर्म और संस्कारों से जुड़ रही है या दूर हो रही है?

• क्या ऐसे आयोजन समाज को एकजुट करने में प्रभावी हैं?

• क्या हमें अपने धार्मिक इतिहास को और गहराई से समझने की जरूरत है?

Q1. जिनशासन स्थापना दिवस क्या है?

Q2. इस दिन का धार्मिक महत्व क्या है?

Q3. चतुर्विध संघ में कौन-कौन शामिल हैं?

Q4. इस आयोजन का उद्देश्य क्या है?

✍️ अब आपकी बारी!

इन सभी सवालों पर अपनी राय और जवाब नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। आपकी सोच ही लोकतंत्र की ताकत है।

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प्रेषक - शांतीलाल साकरिया शिवमोग्गा।

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