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क्या नवीन पटनायक मॉडल अपनाएंगे स्टालिन? DMK-कांग्रेस दूरी में BJP तलाश रही नई राजनीतिक संभावनाएं

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • May 22
  • 4 min read
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भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

नई दिल्ली/चेन्नई, 22 मई। Bharatiya Janata Party और Dravida Munnetra Kazhagam के बीच संभावित राजनीतिक समीकरणों को लेकर राष्ट्रीय राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। तमिलनाडु की हालिया राजनीतिक परिस्थितियों और कांग्रेस-डीएमके संबंधों में आई खटास के बीच भाजपा अब दक्षिण भारत में नई रणनीतिक संभावनाएं तलाशती दिखाई दे रही है।

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, भाजपा यह आकलन कर रही है कि क्या डीएमके भविष्य में कुछ मुद्दों पर केंद्र सरकार को समर्थन दे सकती है। हालांकि अभी किसी औपचारिक गठबंधन के संकेत नहीं हैं, लेकिन संसद में संख्या बल की राजनीति और बदलते क्षेत्रीय समीकरणों ने इस संभावना को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसा होता है तो यह भारतीय राजनीति में “नवीन पटनायक मॉडल” जैसा समीकरण बन सकता है, जहां कोई क्षेत्रीय दल औपचारिक रूप से NDA में शामिल हुए बिना मुद्दों के आधार पर केंद्र सरकार को समर्थन देता है।

कांग्रेस-DMK रिश्तों में क्यों आई दूरी?

हालिया विधानसभा चुनावों के बाद Indian National Congress और Dravida Munnetra Kazhagam के संबंधों में तनाव खुलकर सामने आया।

राजनीतिक हलकों में चर्चा तब तेज हुई जब डीएमके नेताओं ने कांग्रेस पर “पीठ में छुरा घोंपने” जैसे आरोप लगाए। इसके बाद डीएमके ने लोकसभा अध्यक्ष Om Birla को पत्र लिखकर संसद में सीटिंग अरेंजमेंट बदलने का अनुरोध किया, ताकि उसके सांसद कांग्रेस सांसदों के साथ न बैठें।

इस घटनाक्रम ने राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

BJP को कहां दिख रहा फायदा?

सूत्रों के हवाले से सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, भाजपा मानती है कि डीएमके फिलहाल राजनीतिक दबाव की स्थिति में है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में नई पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) के उभार और कांग्रेस के कथित रूप से उससे नजदीक आने से डीएमके की रणनीतिक स्थिति कमजोर हुई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए राज्य और केंद्र दोनों जगह विपक्ष में बने रहना कठिन होता है। ऐसे में भाजपा यह संभावना तलाश रही है कि डीएमके कम से कम संसद में कुछ मुद्दों पर सहयोगी रुख अपना सकती है।

इतिहास भी इस संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करता। Atal Bihari Vajpayee के नेतृत्व वाली NDA सरकार में डीएमके पहले भी शामिल रह चुकी है। हालांकि 2004 के बाद पार्टी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले UPA का साथ पकड़ लिया था।

रास्ते में दो बड़े रोड़े

हालांकि भाजपा और डीएमके के बीच संभावित समीकरणों की राह आसान नहीं मानी जा रही।

1. परिसीमन और भाषा विवाद

M. K. Stalin के नेतृत्व वाली डीएमके लंबे समय से परिसीमन (Delimitation) और त्रिभाषा नीति का विरोध करती रही है।

डीएमके का आरोप है कि प्रस्तावित परिसीमन दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमजोर कर सकता है। यही मुद्दा हालिया चुनाव अभियान का बड़ा केंद्र भी रहा। ऐसे में पार्टी के लिए इस मुद्दे पर नरम रुख अपनाना राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

2. सनातन धर्म विवाद

दूसरा बड़ा विवाद सनातन धर्म को लेकर डीएमके नेताओं के बयानों से जुड़ा है।

पूर्व उपमुख्यमंत्री Udhayanidhi Stalin द्वारा सनातन धर्म पर दिए गए बयानों ने भाजपा और डीएमके के बीच वैचारिक दूरी को और बढ़ा दिया था। भाजपा लगातार इन बयानों को मुद्दा बनाती रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, वैचारिक विरोध के बावजूद यदि दोनों दलों के बीच किसी प्रकार का “इश्यू बेस्ड सपोर्ट” बनता है, तो यह भारतीय राजनीति का बड़ा बदलाव माना जाएगा।

संसद के आंकड़ों का गणित क्यों अहम?

राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि संसद में दो-तिहाई बहुमत की कमी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। हाल ही में परिसीमन से जुड़े विधेयक पर सरकार को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया था।

ऐसे में भाजपा उन क्षेत्रीय दलों के समर्थन की तलाश में है जो NDA का औपचारिक हिस्सा न होते हुए भी संसद में सरकार का साथ दे सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा की रणनीति Naveen Patnaik की Biju Janata Dal, Y. S. Jagan Mohan Reddy की YSR Congress Party और K. Chandrashekar Rao की Bharat Rashtra Samithi जैसी पार्टियों के मॉडल से प्रेरित बताई जा रही है।

लोकसभा में डीएमके के 22 सांसद हैं, ऐसे में उसका समर्थन संसद के गणित में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

आपके मन में उठ रहे सवाल? (Q&A Section)

Q1. भाजपा और DMK के बीच चर्चा क्यों हो रही है?

कांग्रेस और DMK के रिश्तों में आई दूरी के बाद भाजपा संभावित राजनीतिक सहयोग की संभावना तलाश रही है|

Q2. “नवीन पटनायक मॉडल” क्या है?

ऐसा मॉडल जिसमें कोई क्षेत्रीय दल NDA में शामिल हुए बिना मुद्दों के आधार पर केंद्र सरकार का समर्थन करता है।

Q3. भाजपा को DMK से क्या फायदा हो सकता है?

लोकसभा में DMK के 22 सांसद हैं, जिससे संसद में संख्या बल मजबूत हो सकता है।

Q4. सबसे बड़े विवाद कौन से हैं?

परिसीमन, भाषा नीति और सनातन धर्म को लेकर वैचारिक मतभेद सबसे बड़े रोड़े माने जा रहे हैं।

Q5. क्या दोनों दल पहले साथ रहे हैं?

हाँ, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान DMK NDA का हिस्सा रह चुकी है।

निष्कर्ष: तमिलनाडु की बदलती राजनीति ने राष्ट्रीय स्तर पर नए समीकरणों की संभावनाओं को जन्म दिया है। कांग्रेस और डीएमके के बीच बढ़ती दूरी जहां विपक्षी गठबंधन के लिए चुनौती मानी जा रही है, वहीं भाजपा इसे रणनीतिक अवसर के रूप में देख रही है। हालांकि वैचारिक मतभेद और क्षेत्रीय मुद्दे इस संभावित समीकरण के सामने बड़ी बाधा बने हुए हैं। आने वाले महीनों में संसद और राज्यों की राजनीति यह तय करेगी कि क्या वास्तव में स्टालिन “नवीन पटनायक मॉडल” की राह पर चलते हैं या यह चर्चा केवल राजनीतिक अटकल बनकर रह जाती है।

कीवर्ड्स: DMK-BJP गठबंधन, एम.के. स्टालिन, तमिलनाडु की राजनीति, नवीन पटनायक मॉडल, कांग्रेस-DMK में दरार

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