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डिग्रियां बढ़ीं, संस्कार क्यों घटे?

  • Writer: धन्ना राम चौधरी
    धन्ना राम चौधरी
  • Jun 4
  • 4 min read

आधुनिक शिक्षा, स्मार्टफोन और संवादहीनता के दौर में बच्चों को किताबी ज्ञान के साथ संस्कारों की भी उतनी ही जरूरत


माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद, विश्वास और संस्कारों पर आधारित मजबूत रिश्ते समाज की सबसे बड़ी पूंजी हैं।
माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद, विश्वास और संस्कारों पर आधारित मजबूत रिश्ते समाज की सबसे बड़ी पूंजी हैं।

भारतार्थ खबर, संवाददाता धन्नाराम चौधरी (Bhaarataarth.com)

डेटलाइन: 03 जून 2026। आज का दौर तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल शिक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का युग है। हर माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने, प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाने और सफल करियर बनाने का सपना देख रहे हैं। इसके लिए परिवार दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं और अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। लेकिन इस दौड़ के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न समाज के सामने खड़ा है—क्या केवल डिग्रियां, अंक और करियर ही जीवन की सफलता का मापदंड हैं, या फिर संस्कार, संवाद और नैतिक मूल्य भी उतने ही आवश्यक हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा व्यक्ति को रोजगार, व्यवसाय और आर्थिक आत्मनिर्भरता का मार्ग दिखाती है, लेकिन जीवन को संतुलित, जिम्मेदार और मर्यादित बनाने का कार्य संस्कार करते हैं। यदि शिक्षा के साथ नैतिक मूल्यों का समावेश न हो, तो व्यक्तित्व अधूरा रह जाता है। यही कारण है कि आज समाज में बढ़ती संवादहीनता, पारिवारिक दूरी और सामाजिक चुनौतियों के पीछे संस्कारों की कमी को भी एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।

डिग्री नहीं, जीवन मूल्यों की भी जरूरत

वर्तमान समय में बच्चों की शैक्षणिक उपलब्धियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन उनके नैतिक और सामाजिक विकास पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। बच्चों को सफलता प्राप्त करने की प्रेरणा देना आवश्यक है, लेकिन उतना ही आवश्यक है उन्हें सम्मान, अनुशासन, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का महत्व समझाना।

परिवार बच्चों की पहली पाठशाला होता है। माता-पिता, दादा-दादी और परिवार के वरिष्ठ सदस्य बच्चों को जो व्यवहारिक शिक्षा देते हैं, वही उनके व्यक्तित्व की नींव बनती है। इसलिए व्यस्त जीवनशैली के बावजूद परिवारों को बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने की आवश्यकता है।

14 से 18 वर्ष: सबसे संवेदनशील उम्र

किशोरावस्था जीवन का वह चरण है जहां शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर बड़े बदलाव होते हैं। 14 से 18 वर्ष की उम्र में बच्चों के मन में अनेक प्रश्न, जिज्ञासाएं और भावनाएं जन्म लेती हैं। इस दौरान उन्हें मार्गदर्शन, समझ और विश्वास की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

यदि इस उम्र में बच्चों को केवल आदेश, प्रतिबंध और डांट का सामना करना पड़े तो वे अपनी समस्याएं परिवार से साझा करने से बचने लगते हैं। कई बार वे अपनी भावनाओं को सोशल मीडिया या बाहरी लोगों के साथ साझा करने लगते हैं, जिससे भटकाव की संभावना बढ़ जाती है।

संवाद ही सबसे बड़ा समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच खुला संवाद कई समस्याओं का समाधान बन सकता है। विशेष रूप से माताओं को अपनी बेटियों के साथ और पिता को अपने बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार अपनाना चाहिए।

जब बच्चों को यह भरोसा होता है कि उनकी बात सुनी जाएगी और समझी जाएगी, तब वे अपने मन की बात बिना किसी भय के साझा करते हैं। यह विश्वास उन्हें गलत निर्णयों और नकारात्मक प्रभावों से दूर रखने में मदद करता है।

स्मार्टफोन की दुनिया और परिवार की जिम्मेदारी

डिजिटल युग में स्मार्टफोन शिक्षा और जानकारी का महत्वपूर्ण साधन बन चुका है, लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग चिंता का विषय भी है। बच्चों को मोबाइल से दूर रखने का सबसे प्रभावी तरीका केवल प्रतिबंध नहीं, बल्कि परिवार का समय और सकारात्मक जुड़ाव है।

जब माता-पिता बच्चों के साथ समय बिताते हैं, उनके साथ चर्चा करते हैं और उन्हें रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करते हैं, तब स्क्रीन पर निर्भरता स्वाभाविक रूप से कम होने लगती है। बच्चों को समाज के इतिहास, संस्कृति, कृषि परंपराओं, आध्यात्मिक मूल्यों और जीवन के नैतिक सिद्धांतों से परिचित कराना भी आवश्यक है।

संस्कार और आधुनिकता का संतुलन जरूरी

समाजशास्त्रियों का मानना है कि आधुनिक शिक्षा और पारंपरिक संस्कार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दोनों का संतुलन ही एक सफल और जिम्मेदार नागरिक का निर्माण करता है। बच्चों को आधुनिक तकनीक, विज्ञान और वैश्विक अवसरों से जोड़ना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी उन्हें अपनी जड़ों, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों से जोड़े रखना भी है।

यदि परिवार बच्चों को विश्वास, संवाद और संस्कारों का वातावरण प्रदान कर सके, तो वे किसी भी परिस्थिति में सही निर्णय लेने में सक्षम बन सकते हैं।

News Source: वैचारिक आलेख एवं सामाजिक चिंतन संकलित एवं प्रस्तुत: भारतार्थ खबर संपादकीय डेस्क

Fact Box

विषय: आधुनिक शिक्षा और संस्कार

मुख्य चिंता: बढ़ती संवादहीनता

फोकस आयु वर्ग: 14–18 वर्ष

समाधान: परिवार, संवाद और संस्कार

संदेश: आधुनिकता के साथ नैतिक मूल्यों का संतुलन

आपके मन में उठ रहे सवाल क्या हैं? FAQ

Q1. क्या केवल डिग्री सफलता के लिए पर्याप्त है?

नहीं, जीवन में सफलता के लिए नैतिक मूल्य, व्यवहार और संस्कार भी आवश्यक हैं।

Q2. 14 से 18 वर्ष की उम्र को संवेदनशील क्यों माना जाता है?

इस उम्र में बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक विकास में तेजी से बदलाव होते हैं।

Q3. बच्चों में बढ़ती संवादहीनता का समाधान क्या है?

माता-पिता और बच्चों के बीच नियमित, खुला और विश्वासपूर्ण संवाद।

Q4. स्मार्टफोन की लत कैसे कम की जा सकती है?

बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताकर और उन्हें रचनात्मक गतिविधियों से जोड़कर।

Q5. आधुनिक शिक्षा और संस्कारों का संतुलन क्यों जरूरी है?

क्योंकि यही संतुलन बच्चों को सफल, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनाता है।

अब आपकी बारी!

इन सभी सवालों पर अपनी राय और जवाब नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। आपकी सोच ही लोकतंत्र की ताकत है।

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